tag:blogger.com,1999:blog-9216577.post110894019692358310..comments2007-04-15T23:31:40.447-04:00Comments on तत्काल : कविता की मौतविजय ठाकुरhttp://www.blogger.com/profile/07434149725823745952noreply@blogger.comBlogger3125tag:blogger.com,1999:blog-9216577.post-1109027968198397432005-02-21T18:19:00.000-05:002005-02-21T18:19:00.000-05:002005-02-21T18:19:00.000-05:00ठाकुरजी,
मेरी टिप्पणी बढते बढते लेख बन गई -
सोचा ...ठाकुरजी, <br />मेरी टिप्पणी बढते बढते लेख बन गई -<br />सोचा <A HREF="http://hindini.com/hindini/?p=17" REL="nofollow"> कह तो दूँ...</A> :)eSwamihttp://www.blogger.com/profile/06088090660351299106noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9216577.post-1109016248021091922005-02-21T15:04:00.000-05:002005-02-21T15:04:00.000-05:002005-02-21T15:04:00.000-05:00आपका और स्वामी जी का लेख दो बार पड़ने के बाद भी आधा...आपका और <A HREF="http://hindini.com/hindini/?p=13" REL="nofollow">स्वामी जी का लेख</A> दो बार पड़ने के बाद भी आधा समझ में आया| पहले देवाशीष , फिर रमण भाई,आप और अब स्वामी जी, लेखन में अनूप शुक्ला और ठलुआ नरेश जैसी गुरूतर अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं| अब शुरूआती कोहरा छटने के बाद साफ नजर आ रहा है कि कि ब्लागजगत में कुछ भारीभरकम लेखनियाँ भी मौजूद हैं| कोई भी यादि बुरा ना माने तो सीधी सच्ची राय यह है कि जीतू,पंकज,आलोक और रवि भाई के लेखन को मैं अपनी श्रेणी में रखता हूँ जो चाहे फटाफट लिखी जाये चाहे पूरे मूड में , पर बात एक ही बार में भेजे में घुस जाती है| जब्कि अगर देवाशीष ,रमण भाई,आप, स्वामी जी, अनूप शुक्ला और ठलुआ नरेश अगर पूरे मूड में लिखे तो मुझे अपने ईंटरमीडिएट में हिंदी साहित्य छोड़ देने का दुष्परिणाम स्पष्ट दिखने लगता है |Atul Arorahttp://www.blogger.com/profile/00089994381073710523noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9216577.post-1108999786001212172005-02-21T10:29:00.000-05:002005-02-21T10:29:00.000-05:002005-02-21T10:29:00.000-05:00किसी को यह समझने की जरूरत महसूस नहीं होती कि क) दू...किसी को यह समझने की जरूरत महसूस नहीं होती कि क) दूसरे वर्ग की संरचना भिन्न क्यों है, ख) उसके सरोकारों और हमारे सरोकारों में क्या कोई अंतर है, और है तो क्यों है, और सबसे बड़ी बात ग) क्या इन दोनों वर्गों का कोई व्यापक गठजोड़ हो सकता है जिससे दोनों का भला हो?<br /><br />********************<br /><br />बडी दमदार बात कही है | किसी ने कहा है कि जब सब एक ही तरह से सोचते हैं , तो कोइ नही सोचता | बडी अच्छी बात है कि कुछ लोग अलग-अलग तरह से सोच रहे हैं |<br /><br />अनुनादअनुनाद सिंहhttp://www.blogger.com/profile/05634421007709892634noreply@blogger.com