tag:blogger.com,1999:blog-9216577.post111328344311791152..comments2007-04-15T23:31:40.720-04:00Comments on तत्काल : आक्टोवियो की टिप्पणियाँविजय ठाकुरhttp://www.blogger.com/profile/07434149725823745952noreply@blogger.comBlogger2125tag:blogger.com,1999:blog-9216577.post-1113608919422555062005-04-15T19:48:00.000-04:002005-04-15T19:48:00.000-04:002005-04-15T19:48:00.000-04:00विजय जीआपका यह लेख वास्तव में सराहनीय है। साहित्यक...विजय जी<BR/>आपका यह लेख वास्तव में सराहनीय है। साहित्यकार श्री कांत वर्मा जी के साथ १९९०<BR/>नोबेल पुरस्कृत श्री ओक्टेवियो पाज़ के साक्षातकार का सारांश बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है।<BR/>कितना सत्य कहा है उन्हों नेः" इस वर्ग (अंग्रेज़ी पढ़े वर्ग) ने भारतीय जीवंत कला को<BR/>म्यूज़ियम की चीज़ बना कर इसकी मौत का इंतज़ाम कर दिया है।" इसके अतिरिक्त आपके स्वयं के विचार भी पाठक के मस्तिष्क पर एक ऐसा प्रभाव छोड़ जाते हैं कि कुछ सोचने के लिये, <BR/>कुछ खोजने के लिये बाध्य हो जाता है।<BR/>इसके लिये धन्यवाद तथा बधाई! <BR/><A HREF="http://www.mpsharma.com/mahavir" REL="nofollow">महावीर</A>Mahavir Sharmahttp://www.blogger.com/profile/12981216608866206448noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9216577.post-1113391025409561892005-04-13T07:17:00.000-04:002005-04-13T07:17:00.000-04:002005-04-13T07:17:00.000-04:00विजय जी,आक्‍टोवियो के विचारों को अपने ब्‍लाग पर,पढ...विजय जी,<BR/>आक्‍टोवियो के विचारों को अपने ब्‍लाग पर,पढा कर, आप ने ,यह सोचने पर मजबूर कर दिया,कि,<BR/>हम अपनी जिन समस्‍याओं के समाधानों के प्रयास में असफल रहे ,उसकी एक सबसे प्रमुख वजह यह थी ,या ,है ,कि समस्‍याओं का जितना <BR/>निर्मम विशलेषण किया जाना चाहिए था,वह हुआ नहीं।<BR/>बाहर का आदमी,कभी-कभी उन कारणों व उनके कारकों,को जितनी स्‍पष्‍टता से देखता है,और उसे अभिव्‍यक्त कर पाता है,वह शायद इसीलिए सम्‍भव हो पाता है,कि,उसे,मौजूद चीजों के प्रति,निष्‍ठुरता बरतने में,किसी वर्ग या विचारों के पक्षधर बने रहने का व्रत आड़े नहीं आता।<BR/><BR/>-राजेश कुमार सिंहRAJESH KUMAR SINGHnoreply@blogger.com