Sunday, November 28, 2004

यार जुलाहे

कितने तागे टूट गये हैं
पैबंदें भी मसक गयी हैं
झिर-झिर रिसता शीत लहू में
दरक गई है धड़कन जमकर
सिसकी जैसे अतिक्रंदन की
यार जुलाहे……

भेद रही है पछुआ दिल को
कोई पिरोये नश्तर जैसे
बुझे हैं दीपक, बुझी अलावें
प्राणांतक षडयंत्र शीत का
कोप हो जैसे कैकेयी का
यार जुलाहे ………

बुन कुछ ऐसी, अबके चादर
तान के लंबी, बेचूँ घोड़े
बुन लूँ मैं कुछ ख़ाब सुनहरे
ग़र सूरज भी निकले सिर पर
ख़ाब हमारा कभी न पिघले
यार जुलाहे……


Sunday, November 21, 2004

लालिमा

पहचानने लगा हूँ, लालिमा तेरी मैं,
जो चुनरी की लाल सलवटों से हो,
तेरे होठों कि दहक में फैल जाती है,
और झरती है बनके फूँह, बूँद-बूँद
कभी तेरी हया, कभी क्रोधाग्नि होकर॥

रुप के प्रारुप से होता है साक्षात,
निश दिन, उषा की अंगड़ाई से,
प्रात: के किरणों की तरुणाई से,
बोझिल साँझ शिथिल होने तक,
रहता है शेष किन्तु वही सूर्य, वही तू॥

बदलती हुई मुख-भंगिमा तेरी
बदलती हुई लालिमा- सूरज की
ताकता रहता हूँ अभिभूत सा
समझ आते हैं अभिप्राय तेरे सारे
पहचानने लगा हूँ लालिमायें तेरी॥