नये साल की देहरी पर मुस्काता सा चाँद नया हो
नये मोतियों से खुशियों के, दीप्त सीप नैनों के तेरे.
हर भोर तेरी हो सिन्दूरी, हर साँझ ढले तेरे चित में
झंकार करे वीणा जैसी, हर पल के तेरे आँगन में.
जगमग रोशन तेरी रातें झिलमिल तारों की बारातों से
सूरज तेरा दमके बागों में और जाग उठे सारी कलियाँ.
रस-प्रेम लबालब से छलके तेरे सागर का पैमाना
तेरी लहरें छू लें मुझको सिक्त जरा हो मन अपना.
महकाये तुझको पुरवाई, पसरे खुशबू हर कोने में
वेणी के फूलों से अपने इक फूल बचाकर तुम रखना.
कोई फफोला उठे जो मन में, बदली काली आये कोई
टीस और बूँदें पलकों की, निर्द्वंद नाम मेरे कर देना.
सजा रहा हूँ इक गुलदस्ता नये साल की सुबह-सुबह मैं
तकती क्या हो, आओ कुछ गुल तुम भी भर लो न !!
Wednesday, December 29, 2004
Tuesday, December 28, 2004
सुनामी लहरें
कल सुबू फिर से उठी लहरें
रौद्र होकर धरती से मिलने
लौट चली है अब घर अपने
आगोश में समेटे कस कर
कई यादें, कई सपने,कई रिश्ते
बिलखता छोड़ अपने पीछे
मातम की ये इंसानी बस्तियाँ
अरी ओ अल्हड़ सुनामी लहरें
हम तो यूँ भी आते थे पासतेरे,
शायद तुझे सबर ही नहीं
पर हारेंगे नहीं जान ले तू
तेरे इसी मलबे से निकलेंगे
और भी सपने, और भी रिश्ते नये.
रौद्र होकर धरती से मिलने
लौट चली है अब घर अपने
आगोश में समेटे कस कर
कई यादें, कई सपने,कई रिश्ते
बिलखता छोड़ अपने पीछे
मातम की ये इंसानी बस्तियाँ
अरी ओ अल्हड़ सुनामी लहरें
हम तो यूँ भी आते थे पासतेरे,
शायद तुझे सबर ही नहीं
पर हारेंगे नहीं जान ले तू
तेरे इसी मलबे से निकलेंगे
और भी सपने, और भी रिश्ते नये.
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