कालाबार का राजा इयाम्बा बहुत ही शक्तिशाली था। उसकी दो सौ पत्नियां थीं, लेकिन किसी से भी उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई थी। उसकी प्रजा ने उसे बूढा होता देख, उसे मकड़ी की बेटी से शादी करने की प्रार्थना की क्योंकि मकड़ी के बहुत सारे बच्चे होते हैं।
राजा मान गया। लेकिन जब उसने मकड़ी की बेटी को देखा तो उसे वह अच्छी नहीं लगी, वह बदसूरत जो थी। तब लोगों ने कहा कि मकड़ी की बेटी ऐसी इसलिए है क्योंकि उसकी मां ने एक साथ कई बच्चों को जन्म दिया था।
प्रजा को खुश करने के लिए राजा ने उस बदसूरत लड़की से शादी कर ली और उसे अपने महल में ले आया। लेकिन बदसूरत होने के कारण कोई भी उसके साथ रहने को तैयार नहीं था। तब राजा ने उसके लिए एक अलग महल बनवाया।
यों तो सब उसकी बदसूरती पर नाकभौं सिकोड़ते, लेकिन असल में बहुत सुंदर थी वह।
बात यह थी कि वह दो चमड़ियां लेकर जन्मी थी, एक बदसूरत और दूसरी खूबसूरत। जन्म के समय किसी संत ने उसकी मां से वादा करवाया गया था कि वह अपनी उस बेटी की बदसूरत चमड़ी सिर्फ़ रात के समय ही कुछ देर के लिए हटाएगी और सुबह होने से पहले ही वह वापस उसी बदसूरत चमड़ी में आ जाएगी। यानी सिर्फ़ रात के समय ही वह खूबसूरत दिख सकती थी।
राजा की बड़ी पत्नी को यह बात पता थी। लेकिन उसे डर था कि कहीं राजा को उसकी खूबसूरती का पता न चल जाए और वह उससे प्यार न करने लग जाए। वह एक तांत्रिक के पास गयी और उसे दो सौ अशर्फ़ियों का लालच देते हुए एक ऐसी दवा तैयार करने को कहा जिससे उसका पति मकड़ी की बेटी को भूल ही जाए। तांत्रिक साढे तीन सौ अशर्फ़ियों के बदले में ऐसी दवा बनाने को तैयार हो गया। बड़ी रानी तांत्रिक से दवा लेकर महल में आई और उसे राजा के भोजन में मिला दिया।
अब राजा मकड़ी की बेटी को भूल गया। इस तरह चार महीने बीत गए। उसने अदजाहा (मकड़ी के बेटी का यही नाम था) को अपने पास नहीं बुलाया तो अदजाहा अपने मायके चली गयी।
बेटी को दुखी देख अदजाहा के पिता उसे तांत्रिक के पास ले गये। तांत्रिक ने झट से बड़ी रानी की करतूत के बारे में बता दिया। फ़िर अदजाहा के पिता को आश्वासन दिया कि वह ऐसी दवा तैयार करेगा जिससे राजा को अदजाहा की याद हो आएगी। आखिरकार दवा बन ही गयी। अदजाहा ने राजा के लिए अच्छे अच्छे पकवान तैयार किए और उसमें दवा मिला कर राजा को दे दिए।
राजा ने वह पकवान खाए और उसे अदजाहा की याद हो आयी। राजा ने उस शाम उसे अपने पास बुलवाया। अदजाहा बहुत खुश थी। उसने नदी में जाकर स्नान किया और शाम को अपने सबसे सुंदर कपड़े पहनकर राजा के महल में गयी।
शाम हो चुकी थी, बत्तियाँ बुझा दी गयी थी। अदजाहा ने अपनी बदसूरत चमड़ी उतार कर सुंदर चमड़ी धारण कर ली। राजा उसकी सुंदरता को निहारता रहा। लेकिन सुबह होते ही अदजाहा ने फिर से अपनी बदसूरत चमड़ी धारण कर ली और अपने महल में वापस चली गयी।
चार दिन तक लगातार वह ऐसा करती रही, हमेशा रात होने पर वह सुंदर बन जाती और सुबह होने से पहले वह अपनी बदसूरत चमड़ी धारण कर लेती। इसी बीच सबके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उसने एक पुत्र को जन्म दिया। सबसे बड़ी हैरानी की बात तो यह थी कि उसका एक ही बेटा हुआ था जबकि उसकी मां एक बार में पचास पचास बच्चों को जन्म देती थी।
पुत्र पैदा होने पर बड़ी रानी को अदजाहा से अब और भी ईर्ष्या होने लगी थी। वह फिर से उसी तांत्रिक के पास गयी और उसे भारी रक़म देकर उससे एक ऐसी दवा बनाने को कहा जिससे राजा अपने पुत्र को ही भूल जाए। साथ ही दवा के असर से राजा को तांत्रिक के पास आना पड़े ताकि वह राजा को बता सके कि जब तक वह अपने पुत्र को पानी में डुबो नहीं देता, वह ठीक नहीं होगा।
राजा ने वह दवा पी ली और उसके असर से उसे तांत्रिक के पास जाना पड़ा। तांत्रिक ने राजा को वही बातें बताई जो बड़ी रानी ने उसे सिखाया था। राजा अपने पुत्र को मारने को तैयार नहीं हुआ। तब उसकी प्रजा ने उस पुत्र को मार डालने की प्रार्थना की और कहा कि साल भर में ही राजा को दूसरा पुत्र प्राप्त होगा। आखिरकार राजा मान गया और उसने अपने बेटे को नदी में फिकवा दिया और अदजाहा अपने बेटे के लिए रोती रही। फिर मायके चली गयी। उसने अपने पिता के तांत्रिक मित्र से फिर से दवा लाकर राजा को पिलायी। अब राजा को फिर अदजाहा याद हो आई। उसने अदजाहा को फिर से अपने पास बुलाया और वह पहले की तरह ही रहने लगी। इसी बीच, अदजाहा के पिता का तांत्रिक मित्र जो पानी में रहता था, अदजाहा के पुत्र को नदी में फेंके जाते समय वहीं मौज़ूद था। उसने राजा के बेटे को मरने नहीं दिया और उसे अपने पास रखकर पालता रहा। थोड़े ही दिनों में वह बाँका छैला बन गया। उसका शरीर काफी बलिष्ठ हो गया।
कुछ समय बाद अदजाहा ने एक पुत्री को जन्म दिया, और बड़ी रानी ने उसे भी नदी में फिकवाने के लिए राजा को मना लिया। हालांकि राजा को मनाने में उसे काफी वक़्त लगा लेकिन वह मान गया। उसने अदजाहा की पुत्री को पानी में फिकवा दिया और अदजाहा को फिर से भूल गया।
लेकिन इस बार भी पानी में रहने वाला अदजाहा के पिता का तांत्रिक मित्र तैयार था। उसने राजा की पुत्री को भी बचा लिया। उसने सोचा कि अब बड़ी रानी को सबक सिखाने का समय आ गया है। वह गया और अपने गाँव के प्रधान से जाकर मिला और उससे बाज़ार में हर हफ़्ते एक कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन करने की प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना मान ली गयी। अदजाहा का पुत्र जो अब काफी बलिष्ठ हो चुका था और दिखने में कुछ कुछ अपने पिता की तरह लगता था, तांत्रिक ने उससे कहा कि वह इस प्रतियोगिता में भाग लिया करे और कोई उसे पछाड़ नहीं सकेगा। कई हफ़्तों तक चलने वाली इस प्रतियोगिता के बाद तांत्रिक ने एक बड़ी प्रतियोगिता का आयोजन करने की बात तय की जिसमें पूरे देश के बलशाली पुरुषों को हिस्सा लेना था। राजा ने इस प्रतियोगिता में अपनी बड़ी रानी के साथ उपस्थित रहने का भी आश्वासन दिया।
प्रतियोगिता के दिन तांत्रिक ने अदजाहा के बेटे को खूब समझाया कि वह डरे नहीं और उसने उसे बताया कि उसने उसे ऐसी शक्ति दी है कि देश का बड़े से बड़ा पहलवान भी उसके आगे चंद मिनट टिक नहीं सकता। प्रतियोगिता में एक से बढकर एक पहलवान जमा हुए थे और राजा ने विजेता को खूब सारी दौलत देने का वादा किया था। जब उन्होंने राजा के बेटे को देखा, जिसे कोई नहीं जानता था तो वे उस पर हँसने लगे और कहने लगे कि ये पिद्दी सा बच्चा कौन है? वह हमारे मुकाबले कहाँ टिकेगा। लेकिन जब वे युद्ध के लिए अखाड़े में उतरे तो थोड़ी देर में ही उन्हें लग गया कि वे खुद उसके सामने बच्चे हैं। वह दिखने में बहुत सुंदर था और सब आश्चर्य में थे कि आखिर राजा का चेहरा उससे मिलता कैसे है।
दिन भर की प्रतियोगिता के बाद अदजाहा के बेटे को विजेता घोषित कर दिया गया, जो भी उसके ख़िलाफ़ खड़ा हुआ, उसने मुँह की खाई, कइयों के तो हाथ पैर की हड्डियाँ भी टूट गयी थी। उसके बल के आगे किसी का जोर न चला।
प्रतियोगिता के बाद राजा ने उसे वस्त्राभूषण इत्यादि उपहार में दिये और शाम को उसे अपने साथ भोजन के लिए राजमहल में बुलाया। राजा के पुत्र ने खुशी खुशी अपने पिता का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। शाम को उसने नदी में अच्छी तरह स्नान किया और अच्छे कपड़े पहन कर राजमहल पहुँचा जहाँ उसकी मुलाक़ात राजसी खानसामों और राजा की प्रिय पत्नियों से हुई।
और तब वे भोजन के लिए बैठे। राजा के ठीक बगल में अदजाहा का पुत्र बैठा था, राजा को मालूम भी न था कि वह उसका अपना पुत्र है। दूसरी ओर राजा की इर्ष्यालु पत्नी बैठी थी जो सारे मुसीबत की जड़ थी। पूरे भोजन के दौरान उस रानी ने उस लड़के को प्रभावित करने की भरपूर कोशिश की क्योंकि वह दिखने में सुंदर था, बलशाली था और देश के अच्छे पहलवानों को धूल चटा चुका था।
बड़ी रानी मन ही मन सोच रही थी, “काश यह लड़का मेरा पति बन सकता, मेरा पति तो अब बूढा हो चला है, जल्द ही किसी दिन इस दुनिया से कूच कर जाएगा।“ और यह लड़का जो जितना बलशाली था उतना ही बुद्धिमान भी, उसे खूब अंदाजा था कि रानी क्या सोच रही है, लेकिन फिर भी वह रानी के साथ प्रसन्न होने का स्वांग करता रहा।
जब वह अपने नाना के तांत्रिक मित्र के पास पहुँचा तो लड़के ने राजमहल की सारी बात उसे बताई, तांत्रिक ने कहा: “अब तो तुम राजा के चहेते बन गये हो, अब तुम्हें कल राजा के पास फिर से जाना चाहिए और उनसे एक विनती करनी चाहिए। तुम्हें राजा से कहना है कि वे देश के सभी नागरिकों की एक सभा बुलवाएँ क्योंकि उसे एक महत्वपूर्ण मामले को सबके सामने रखना है, और जब मामले की सुनवाई हो जाए तो जो भी स्त्री या पुरुष दोषी सिद्ध हो उसे जल्लाद के हाथों सबके सामने सौंप देना चाहिए”
लड़का अगली सुबह फिर से राजमहल गया और उससे अपनी बात कही, राजा जन-सुनवाई के लिए सहर्ष तैयार हो गया। एक दिन निश्चित कर उसने सभी को मुनादी कर निमंत्रण भिजवा दिया।
लड़का फिर तांत्रिक के पास गया, तांत्रिक ने उसे अपनी माँ अजदाहा के पास जाने को कहा। तांत्रिक ने उसे अपनी माँ से कहने को कहा कि जिस दिन जनसुनवाई होगी वही दिन उसके कुरुप चमड़ी त्यागने का दिन होगा, उस दिन वह खूब सज-धज कर जनसुनवाई में पहुँचे। लड़के ने वैसा ही किया।
जब सुनवाई का दिन आया तो उस दिन अदजाहा सुनावाई वाले मैदान के एक कोने में बैठी, और अज़नबी सुंदरी को किसी ने नहीं पहचाना कि वही मकड़ी की बेटी है। अदजाहा की बगल में उसका पुत्र अपनी बहन के साथ आकर बैठ गया तो अज़दाहा ने तुरंत अपनी बेटी को पहचान लिया और कहा – “यही मेरी बेटी है जिसको मरा समझकर मैंने इतना शोक मनाया” और यह कहते हुए उसने अपनी बेटी को स्नेहपूर्वक गले लगा लिया।
फिर राजा और बड़ी रानी समेत सभी गणमान्य लोगों ने अपना-अपना स्थान ग्रहण किया। लोग आते जा रहे थे और राजा का अभिवादन भी करते जा रहे थे। थोड़ी देर बाद राजा ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने सबको कुश्ती प्रतियोगिता में देश के बड़े बड़े पहलवानों को पछाड़ने वाले लड़के की विनती पर ये सभा बुलाई है। इस सुनवाई में जो भी दोषी ठहराया जाएगा उसे ज़ल्लाद के हवाले कर दिया जाएगा। राजा ने कहा कि यदि फ़ैसला लड़के के हक़ में हुआ तो दूसरे पक्ष को मरने के लिए तैयार रहना पड़ेगा चाहे दोषी राजा खुद या उनकी कोई रानी ही क्यूँ न हो।
सभी उपस्थित लोगों ने राजा की बातों से सहमति जताई, और उन्होंने लड़के की बात जानने की इच्छा ज़ाहिर की कि आखिर लड़का कहना क्या चाहता है। और तब लड़के ने पूरे सभास्थल का चक्कर लगाकर लोगों और राजा का अभिवादन करते हुए पूछा – क्या मैं किसी राजा का पुत्र होने योग्य नहीं? और सभी लोगों ने एक सुर में लड़के की बात का समर्थन किया। फिर लड़का अपनी बहन का हाथ पकड़ कर सामने लाया। उसकी बहन अत्यंत खूबसूरत थी। जब सब लोग उसकी तरफ़ देखने लगे तो उसने पूछा – “क्या मेरी बहन किसी राजा की पुत्री होने योग्य नहीं?” और सभी लोगों ने फिर एक सुर में कहा कि लड़की अवश्य किसी भी राजा की पुत्री होने योग्य है।
और फिर उसने अपनी माँ अजदाहा को बुलाया, वह सामने आई, अपने सबसे अच्छे कपड़ो और गले में मोतियों की माला के साथ वह बहुत खूबसूरत दिख रही थी। सभी लोगों ने झुककर उस सुंदरी का अभिवादन किया, इससे पहले उन्होंने इतनी सुंदर स्त्री कभी नहीं देखी थी। और तब लड़के ने फिर लोगों से पूछा – “क्या यह महिला किसी राजा की रानी होने योग्य नहीं?” और सभा में उपस्थित एक-एक आदमी ने कहा कि निश्चित तौर पर वह किसी राजा की पत्नी होने योग्य ही है।
और तब वह बाँका उस इर्ष्यालु औरत जो राजा के साथ बैठी हुई थी, की ओर इशारा करते हुए लोगों से उसकी कहानी सुनाने लगा कि कैसे उसकी माँ जिसे दो चमड़ी मिली हुई थी, की शादी राजा से हुई और बड़ी रानी ने किस तरह उसे रास्ते से हटाने और उसके बेटे-बेटी को मारने के लिए क्या क्या षडयंत्र किए।
उस लड़के ने कहा: “मैं इस मामले का फैसला आप सब पर छोड़ता हूँ। यदि मेरा कोई दोष बनता हो तो मैं सूली पर चढने को तैयार हूँ और हाँ यदि मेरा कोई दोष नहीं और दोषी यह औरत है तो उसे आपके निर्णय के अनुसार ज़ल्लादों को सौंप देना चाहिए।"
जब राजा को पता चला कि मलयुद्ध में सबको परास्त करने वाला और कोई नहीं उसका अपना पुत्र है तो वह अत्यंत खुश हुआ और उस इर्ष्यालु औरत को राज्य के क़ानून के अनुसार ज़ल्लादों के हाथ सौंप दिया गया। अदज़ाहा को राजा के चाकर पालकी में बिठाकर राजमहल ले गये। उस रात राजा ने अपनी प्रजा के लिए एक बड़े भोज का आयोजन किया जो पूरे सोलह दिनों तक जारी रहा। राजा अपनी मकड़ी रानी के साथ खुशी खुशी रहने लगे।
(नाईजीरियाई लोककथा पर आधारित)
Friday, April 14, 2006
Tuesday, December 06, 2005
पुस्तक समीक्षा: विदेश रिपोर्टिंग
पुस्तक: विदेश रिपोर्टिंग
लेखक: रामशरण जोशी
प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड, नई दिल्ली
पृष्ठ: 135
मूल्य: डेढ सौ रुपये
प्रख्यात पत्रकार, अध्यापक, और समाजशास्त्री रामशरण जोशी की खाँटी पत्रकार से इतर लेखकीय प्रतिभा के उदाहरण इन दिनों काफी जल्दी-जल्दी पाठकों और छात्रों के सम्मुख आ रहा है। पिछले दिनों राजेन्द्र यादव के संपादकत्व वाली साहित्य पत्रिका 'हंस' के 'आत्म-स्वीकृतियाँ' स्तंभ में अपनी मार्मिक, बेबाक, और साफ़गोई से लबरेज संस्मरण के माध्यम से हिन्दी साहित्य जगत में उथल-पुथल मचाने के बाद मीडिया से जुड़े छात्रों, अध्यापकों, और पत्रकारों के लिए उनकी नयी पुस्तक 'विदेश रिपोर्टिंग' एक बेहतरीन लेखकीय उपहार स्वरुप है। दो दशकों से भी ज्यादा से सक्रिय पत्रकार और नई दुनिया समाचारपत्र से जुड़े श्री जोशी को कम से कम इस बात का श्रेय तो देना ही पड़ेगा कि विदेश रिपोर्टिंग जैसे विषय पर अपने अनुभवों को लेखनीबद्ध कर एवं पुस्तकाकार रुप मे पाठकों तक पहुँचाकर उन्होंने हिन्दी मीडिया जगत में एक रिक्तता की पूर्ति की है।
आज पत्रकार चाहे अँग्रेजी का हो या अन्य भाषाई अख़बारों का, सभी का सपना होता है 'डिप्लोमेटिक कोरोसपोंडेंट' (कूटनीतिक संवाददाता) बनने की। चूँकि विदेश रिपोर्टिंग का क्षेत्र न सिर्फ़ अत्यंत व्यापक और ग्लैमर से भरा है, बल्कि इसमें अधिक मात्रा में धनोपार्जन, विदेश-यात्रा, और पत्रकार मंडली में बड़ा रुतबा हासिल होने की अपार संभावनाएँ निहित हैं। इसलिए हर अख़बार और टेलीविज़न चैनलों के संवाददाताओं का रुझान आज इस दिशा में ज्यादा से ज्यादा हो रहा है। परंतु विदेश रिपोर्टिंग में जहाँ विशेष आकर्षण हैं, वहीं यह क्षेत्र उतना ही जटिल और चुनौतियों से भरा है। रामशरण जोशी जी पत्रकारिता के छात्रों और अन्य जिज्ञासुओं के लिए विदेश रिपोर्टिंग की इन्हीं जटिलताओं, चुनौतियों, बुराइयों और अच्छाइयों को अत्यंत गंभीरता-पूर्वक अपने अनुभवों में लपेटकर परत दर परत खोलते हैं।
संपूर्ण पुस्तक को दो भागों में बाँटा गया है। जहाँ पुस्तक का पहला भाग, जो लगभग एक तिहाई हिस्सा है, इस विदेश रिपोर्टिंग के सैद्धांतिक पहलुओं की व्यापक चर्चा करता है, वहीं पुस्तक का शेष दो तिहाई हिस्सा विदेश रिपोर्टिंग के व्यवहारात्मक पहलुओं पर केंद्रित रखा गया है। पहले हिस्से में हलाँकि खुद जोशी जी के शब्दों में विदेश रिपोर्टिंग के किसी "क्रांतिकारी" सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं किया गया है परंतु प्रारंभिक पचास पृष्ठों में विदेश रिपोर्टिंग के अलग-अलग पक्षों की चर्चा विस्तार से की गयी है जो महत्वाकांक्षी प्रशिक्षु पत्रकारों और इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले अन्य लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है। विदेश रिपोर्टिंग क्या है?, इसमें कौन-कौन सी समस्याएँ हैं?, रिपोर्टिंग कैसे करनी चाहिए?, रिपोर्टर से क्या अपेक्षाएँ होती हैं और इसके व्यवहारात्मक पहलू क्या-क्या हैं? इत्यादि जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों की विस्तार से चर्चा पहली बार हिन्दी माध्यम से किसी पुस्तक में की गयी है। खास तौर पर विदेश रिपोर्टरों की चयन प्रक्रिया, विदेश रिपोर्टिंग के सिलसिले में की जाने वाली तैयारियाँ, सुरक्षा-जाँच और अन्य औपचारिकताएँ, मेज़बान देशों में ध्यान देने योग्य बातें, और विदेश रिपोर्टिंग की विशिष्टता की परिचर्चा और इस संबध में जोशी जी के निजी अनुभवों को इन अनुभागों से जोड़कर प्रस्तुत करना इस पुस्तक के सबसे उपयोगी बिंदु मानी जा सकती है।
यद्यपि पूरे पुस्तक में ही जोशी जी के विदेश रिपोर्टिंग से संबधित व्यवहारात्मक अनुभव बिखरे पड़े हैं परंतु पुस्तक का दूसरा खंड को विशेष तौर पर "व्यवहारात्मक अनुभव" शीर्षक से अलग चिन्हित एवं प्रस्तुत किया गया है। इस खंड की शुरुआत किसी संस्मरण की तरह की गयी है जिसमें सबसे पहले जोशी जी ने भारत के विभिन्न राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, और प्रधानमंत्री के साथ किए गये विदेश दौरे को पुस्तक के पहले खंड 'विदेश रिपोर्टिंग के सिद्धांत से जोड़ने की कोशिश की गयी है। इसके बाद के दो पृष्ठ भी इसी फार्मेट में लेखक की पाकिस्तान यात्राओं और वहाँ प्रस्तुत चुनौतियों के बारे में समर्पित है। शेष पुस्तक में रामशरण जोशी द्वारा विदेश-संवाददाता के तौर पर 1985 से 1995 तक (नई दुनिया) अख़बार को भेजे और मुद्रित किए गये कतिपय श्रेष्ठ रिपोर्टों का संकलन है, जो एक ‘पुरालेख’ (आर्काइव्स) की तरह है। इन रिपोर्टों में राजीव और थैचर शिखर वार्ता से लेकर नामीबिया का स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में उदय, और भारत-पाकिस्तान संबंध जैसे अनेक छोटे-बड़े, मह्त्वपूर्ण उभय-पक्षी और बहुपक्षी मसलों की रिपोर्टिंग शामिल है।
चौबीसों घंटे अहर्निश चलने वाले बीसियों समाचार चैनलों के आज के भारत में मीडिया का हर क्षेत्र जहाँ अन्य क्षेत्रों की तरह विशेषीकृत होता जा रहा है, ऐसे में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों के लिए 'विदेश रिपोर्टिंग' आज एक ख़ास महत्व का क्षेत्र बन गया है। हलाँकि प्रकाशक का दावा है कि चूँकि जोशी जी खुद अध्यापन-कर्म से जुड़े हैं इसलिए इसे थोड़ा बहुत पाठ्य-पुस्तक की तरह ढालने की कोशिश जोशी जी ने की है, परंतु पूरी पुस्तक पढने जोशीमय आवरण चित्र देखकर पुस्तक (निजी) "विदेश-रिपोर्टिंग संस्मरण" की तरह प्रतीत होती है। यदि थोड़ा और श्रम करके कुछ अन्य दिग्गज विदेशी संवाददाताओं के ज्ञात एवं प्रकाशित अनुभव या/और हाल में महत्वपूर्ण विदेशी घटनाओं की कवरेज़ करने वाले पत्रकारों से बात-चीत इत्यादि शामिल की जाती तो निश्चित तौर पर इस पुस्तक को श्रेष्ठ पुस्तकों में शुमार किया जाता। परंतु इन सबके बावज़ूद पुस्तक की उपादेयता इसी बात से प्रमाणित है कि हिन्दी में इस क्षेत्र में अपनी तरह का प्रथम मौलिक प्रकाशन है और निश्चित ही उपयोगी और पठनीय है।
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प्रेस इंस्टीट्यूट आफ़ इंडिया की पत्रिका "विदुर" (हिंदी एवं अँग्रेजी त्रैमासिक) के आगामी अंक में प्रकाश्य
लेखक: रामशरण जोशी
प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड, नई दिल्ली
पृष्ठ: 135
मूल्य: डेढ सौ रुपये
प्रख्यात पत्रकार, अध्यापक, और समाजशास्त्री रामशरण जोशी की खाँटी पत्रकार से इतर लेखकीय प्रतिभा के उदाहरण इन दिनों काफी जल्दी-जल्दी पाठकों और छात्रों के सम्मुख आ रहा है। पिछले दिनों राजेन्द्र यादव के संपादकत्व वाली साहित्य पत्रिका 'हंस' के 'आत्म-स्वीकृतियाँ' स्तंभ में अपनी मार्मिक, बेबाक, और साफ़गोई से लबरेज संस्मरण के माध्यम से हिन्दी साहित्य जगत में उथल-पुथल मचाने के बाद मीडिया से जुड़े छात्रों, अध्यापकों, और पत्रकारों के लिए उनकी नयी पुस्तक 'विदेश रिपोर्टिंग' एक बेहतरीन लेखकीय उपहार स्वरुप है। दो दशकों से भी ज्यादा से सक्रिय पत्रकार और नई दुनिया समाचारपत्र से जुड़े श्री जोशी को कम से कम इस बात का श्रेय तो देना ही पड़ेगा कि विदेश रिपोर्टिंग जैसे विषय पर अपने अनुभवों को लेखनीबद्ध कर एवं पुस्तकाकार रुप मे पाठकों तक पहुँचाकर उन्होंने हिन्दी मीडिया जगत में एक रिक्तता की पूर्ति की है।
आज पत्रकार चाहे अँग्रेजी का हो या अन्य भाषाई अख़बारों का, सभी का सपना होता है 'डिप्लोमेटिक कोरोसपोंडेंट' (कूटनीतिक संवाददाता) बनने की। चूँकि विदेश रिपोर्टिंग का क्षेत्र न सिर्फ़ अत्यंत व्यापक और ग्लैमर से भरा है, बल्कि इसमें अधिक मात्रा में धनोपार्जन, विदेश-यात्रा, और पत्रकार मंडली में बड़ा रुतबा हासिल होने की अपार संभावनाएँ निहित हैं। इसलिए हर अख़बार और टेलीविज़न चैनलों के संवाददाताओं का रुझान आज इस दिशा में ज्यादा से ज्यादा हो रहा है। परंतु विदेश रिपोर्टिंग में जहाँ विशेष आकर्षण हैं, वहीं यह क्षेत्र उतना ही जटिल और चुनौतियों से भरा है। रामशरण जोशी जी पत्रकारिता के छात्रों और अन्य जिज्ञासुओं के लिए विदेश रिपोर्टिंग की इन्हीं जटिलताओं, चुनौतियों, बुराइयों और अच्छाइयों को अत्यंत गंभीरता-पूर्वक अपने अनुभवों में लपेटकर परत दर परत खोलते हैं।
संपूर्ण पुस्तक को दो भागों में बाँटा गया है। जहाँ पुस्तक का पहला भाग, जो लगभग एक तिहाई हिस्सा है, इस विदेश रिपोर्टिंग के सैद्धांतिक पहलुओं की व्यापक चर्चा करता है, वहीं पुस्तक का शेष दो तिहाई हिस्सा विदेश रिपोर्टिंग के व्यवहारात्मक पहलुओं पर केंद्रित रखा गया है। पहले हिस्से में हलाँकि खुद जोशी जी के शब्दों में विदेश रिपोर्टिंग के किसी "क्रांतिकारी" सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं किया गया है परंतु प्रारंभिक पचास पृष्ठों में विदेश रिपोर्टिंग के अलग-अलग पक्षों की चर्चा विस्तार से की गयी है जो महत्वाकांक्षी प्रशिक्षु पत्रकारों और इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले अन्य लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है। विदेश रिपोर्टिंग क्या है?, इसमें कौन-कौन सी समस्याएँ हैं?, रिपोर्टिंग कैसे करनी चाहिए?, रिपोर्टर से क्या अपेक्षाएँ होती हैं और इसके व्यवहारात्मक पहलू क्या-क्या हैं? इत्यादि जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों की विस्तार से चर्चा पहली बार हिन्दी माध्यम से किसी पुस्तक में की गयी है। खास तौर पर विदेश रिपोर्टरों की चयन प्रक्रिया, विदेश रिपोर्टिंग के सिलसिले में की जाने वाली तैयारियाँ, सुरक्षा-जाँच और अन्य औपचारिकताएँ, मेज़बान देशों में ध्यान देने योग्य बातें, और विदेश रिपोर्टिंग की विशिष्टता की परिचर्चा और इस संबध में जोशी जी के निजी अनुभवों को इन अनुभागों से जोड़कर प्रस्तुत करना इस पुस्तक के सबसे उपयोगी बिंदु मानी जा सकती है।
यद्यपि पूरे पुस्तक में ही जोशी जी के विदेश रिपोर्टिंग से संबधित व्यवहारात्मक अनुभव बिखरे पड़े हैं परंतु पुस्तक का दूसरा खंड को विशेष तौर पर "व्यवहारात्मक अनुभव" शीर्षक से अलग चिन्हित एवं प्रस्तुत किया गया है। इस खंड की शुरुआत किसी संस्मरण की तरह की गयी है जिसमें सबसे पहले जोशी जी ने भारत के विभिन्न राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, और प्रधानमंत्री के साथ किए गये विदेश दौरे को पुस्तक के पहले खंड 'विदेश रिपोर्टिंग के सिद्धांत से जोड़ने की कोशिश की गयी है। इसके बाद के दो पृष्ठ भी इसी फार्मेट में लेखक की पाकिस्तान यात्राओं और वहाँ प्रस्तुत चुनौतियों के बारे में समर्पित है। शेष पुस्तक में रामशरण जोशी द्वारा विदेश-संवाददाता के तौर पर 1985 से 1995 तक (नई दुनिया) अख़बार को भेजे और मुद्रित किए गये कतिपय श्रेष्ठ रिपोर्टों का संकलन है, जो एक ‘पुरालेख’ (आर्काइव्स) की तरह है। इन रिपोर्टों में राजीव और थैचर शिखर वार्ता से लेकर नामीबिया का स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में उदय, और भारत-पाकिस्तान संबंध जैसे अनेक छोटे-बड़े, मह्त्वपूर्ण उभय-पक्षी और बहुपक्षी मसलों की रिपोर्टिंग शामिल है।
चौबीसों घंटे अहर्निश चलने वाले बीसियों समाचार चैनलों के आज के भारत में मीडिया का हर क्षेत्र जहाँ अन्य क्षेत्रों की तरह विशेषीकृत होता जा रहा है, ऐसे में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों के लिए 'विदेश रिपोर्टिंग' आज एक ख़ास महत्व का क्षेत्र बन गया है। हलाँकि प्रकाशक का दावा है कि चूँकि जोशी जी खुद अध्यापन-कर्म से जुड़े हैं इसलिए इसे थोड़ा बहुत पाठ्य-पुस्तक की तरह ढालने की कोशिश जोशी जी ने की है, परंतु पूरी पुस्तक पढने जोशीमय आवरण चित्र देखकर पुस्तक (निजी) "विदेश-रिपोर्टिंग संस्मरण" की तरह प्रतीत होती है। यदि थोड़ा और श्रम करके कुछ अन्य दिग्गज विदेशी संवाददाताओं के ज्ञात एवं प्रकाशित अनुभव या/और हाल में महत्वपूर्ण विदेशी घटनाओं की कवरेज़ करने वाले पत्रकारों से बात-चीत इत्यादि शामिल की जाती तो निश्चित तौर पर इस पुस्तक को श्रेष्ठ पुस्तकों में शुमार किया जाता। परंतु इन सबके बावज़ूद पुस्तक की उपादेयता इसी बात से प्रमाणित है कि हिन्दी में इस क्षेत्र में अपनी तरह का प्रथम मौलिक प्रकाशन है और निश्चित ही उपयोगी और पठनीय है।
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