दारोगाजी मूंछों पर ताव देते हुए वहाँ पहुँचे तो देखते हैं कि वहाँ कुहराम मचा हुआ है। चंचला देवी खिड़की की छड़ से अपना सर फोड़ने पर तुली हुई है।
मुंशीजी को देखकर चंचला जोर-जोर से विलाप करने लगी - मेरे भाई से आपकी क्या दुश्मनी थी जो आपने उन्हें गोली मार दी?
मुंशीजी ने डाँटकर कहा - अब ये तिरिया चरित्तर रहने दो। ये तुम्हार भाई नहीं यार है !
चंचला देवी रोती हुई बोली - हे राम ! आप पागल तो नहीं हो गए। आंख है या नहीं। बिरजू भैया को नहीं पहचानते आप। हाय ! हाय ! कैसे छटपटा रहे हैं। मैं तो बंद हूँ। पानी भी कैसे दूँ उनको? पता नहीं उनको भी क्या पड़ी थी ऐसी जगह आने की।
अब मुंशीजी ने अपना टॉर्च प्रकाशमान किया तो अपने साले ब्रजनाथ को देखकर हतबुद्धि हो गये। तब तक मुहल्ले के लोग भी जमा हो गये। ब्रजनाथ को पानी पिलाकर होश में लाया गया और तुरन्त डॉक्टर को बुलाकर मरहम-पट्टी की गयी। गोली पैर में लगी थी, जान बच गयी।
दारोगा साहब सबको यही कहते फिर रहे थे, चोर समझ कर धोखा खा गया। थाने से आ रहा था। अंधेरे में रात के समय खिड़की के पास खड़ा देखा, लगा कोई खिड़की का छड़ काट रहा है, गोली चला दी मैंने।
सबके चले जाने के बाद, चंचला देवी लगी उनसे कहने, दुर ! आपकी बुद्धि भी कैसी हो गयी है। मैं तो बिरजू भैया की आवाज़ सुनकर दौड़ी थी, परंतु बाहर से तो ताला बंद था। उनको प्यास लगी थी। मैं एक गिलास पानी दे रही थी। वो हाथ बढाकर पानी लेने ही लगे थे कि आपने गोली मार दी। हाय राम ! हमलोगों ने ना जाने क्या कुसूर किया था।
मुंशीजी बोले - मेरे पास ज्यादा सत्यवंती मत बनो। ये तो संयोग था कि तुम्हारे भाई साहब बीच में आ गये, नहीं तो तुम्हारे यार की लाश यहाँ तड़प रही होती।
स्त्री ने कहा - आप तो बिल्कुल पागल हो गये हैं। मेरा यार कौन होगा?
मुंशीजी ने कहा - जिसको आज रात तुमने बुलाया था।
चंचला देवी का चेहरा फक हो गया। अचकचा कर पूछा - मैंने बुलाया था?
मुंशीजी - हाँ, बुलाया था। चिट्ठी लिखकर।
चंचला ने पूछा - आप साबित कर सकते हैं?
मुंशीजी ने जेब से चिट बाहर निकाल कर उसके सामने रख दिया। जैसे शिकार फंसने पर बहेलिया खुश होता है वैसे ही वे अपनी मूंछों पर ताव देने लगे।
एकाएक चंचला देवी के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी। उसने पूछा - ये चिट्ठी आपको कहाँ मिली?
मुंशीजी ने अपनी मूंछों पर मरोड़ देते हुए कहा - पिछवाड़े की नाली के पास।
चंचला देवी ने कहा - ये चिट्ठी तो मैंने आपकी बहन को लिखा था। बाद में फाड़ कर फेक दिया। वहीं जाकर खोजिए, इसका दूसरा टुकड़ा भी वहीं कहीं होगा।
जासूसराम फिर से टॉर्च लेकर गये और वैसा ही एक दूसरा टुकड़ा ढूँढ कर ले आये।
चंचला देवी ने कहा - अब दोनों टुकड़ा जोड़कर देखिये जरा।
दोनो टुकड़े जोड़े गये तो पूरी चिट्ठी इस तरह पढी गयी।
परम प्रिय
छोटी दीदी
सप्रेम आलिंगन एवं
स्नेहमयी बच्ची को
बारंबार मुख चुम्बन।
आप कब आएँगी?
मैं आपके आने का
समाचार सुन प्रतिदिन
इंतज़ार कर रही हूँ।
आपके भाई आजकल
बारह बजे रात के बाद
घर आया करते हैं।
आप आ जाइए।
तब सब समझ आएगा।
हम व्याकुल हैं।
आपके भाई साहब
रात दिन विचित्र
संदेह के फेर में
पागल हुए रहते हैं।
लिख नहीं सकती।
आपको दिल
की व्यथा क्या कहूँ। लिफाफ
में चिपकाने के लिए
टिकट नहीं था। इसलिए
कल से छटपटा
रही थी। आज लगा
रही हूँ। आपसे मिलने को
हम व्यग्र हैं। चिन्ता से
छाती धड़क रही है।
कहूँ भी किससे?
लाज छोड़कर लिखती हूं
उन्हें मुझपर ही संदेह है।
आकर प्राण बचाइये।
हर ट्रेन के समय
खिड़की पर बैठी हुई
रहती हूँ। पता नहीं कब
मिलूँगी। विशेष मिलने पर
कहूँगी
आपकी
भाभी
चंचला
देवी
४/३
१९४८
चिट्ठी पढते ही मुंशीजी शर्म से पानी पानी हो गये। बोले - तो अब क्या होना चाहिए?
चंचला देवी चुपचाप उठ कर गयी और शेविंग सेट ले आयी। तब साबुन से ब्रश को भिगा-भिगाकर मूँछों को खूब जोर-जोर से रगड़ कर उसपर धीरे धीरे रेजर चलाने लगी। देखते-देखते दारोगा साहब की मूँछ साफ हो गयी।
समाप्त।
कथाकार - हरिमोहन झा (रंगशाला १९४९ से)
मैथिली से रूपांतरित
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Saturday, October 25, 2008
Friday, October 24, 2008
दारोगाजी की मूंछ - २
और एक दिन अचानक ही मुंशी नौरंगीलाल की जासूसी रंग लाई. करीब रात के बारह बजे वे रात के अंधेरे में अपने घर के पिछवाडे में खड़े हो गए. कर की तरह कान लगाए हुए थे, इधर-उधर कुछ सुनने के लिए कान लगाए हुए. तबतक उनकी नज़र मोड़-माड कर फेके गए कागज़ के टुकड़े पर पडी . उन्होंने लपक कर कागज़ का वो टुकडा उठाया और टॉर्च की रौशनी में लगे पढने उसे. पढ़ते-पढ़ते दारोगा साहब ने मूंछ पर ताव दिया और खुशी से उचल पड़े - वो मारा! पकड़ लिया चोर.
कागज़ का वह चिट लगता था आधे पर से पता हुआ, पुर्जे पर चंचला देवी का नाम भी नीचे लिखा था, उसमे कोई संदेह नहीं.
पाठको की उत्सुकता शांत करने के लिए उस चिट्ठी की नक़ल हूबहू नीचे दे रहा हूँ.
परम प्रिय
सप्रेम आलिंगन और
बारम्बार मुख चुम्बन
हम तुम्हारे आने की
प्रतीक्षा कर रहे हैं
बारह बजे रात के बाद
आप आ जाईये
हम व्याकुल हैं
रात दिन विचित्र
पागल हुई रहती
हूँ. आपको ह्रदय
से चिपकाने के लिए
कल से ही छटपटा
रही हूँ, आप से मिलने को
छाती धड़क रही है.
हम शर्म छोड़ कर लिख रही हैं
आप आकर प्राण बचाइये
मैं खिड़की पर बैठी
रहूँगी. विशेष मिलने पर
आपकी
चंचला
४/३
दारोगा साहब को जैसे तिलिस्म की चाभी हाथ लगा गयी. यत्न-पूर्वक जेब में रख लिया उस पूर्जे को. ४ मार्च की तारीख है. आज ही मिलने का वादा भी है. अब समय नहीं. चटपट करें नहीं तो हाथ में आई चिडिया फुर्र हो जाएगी. खिड़की के सामने एक घना जामुन का पेड़ था. दारोगा जी फुर्ती से चढ़ गए उसपर और बन्दूक को एक दो टहनियों वाले शाखा के साथ अडा कर बैठ गए एक मोटे से टहनी पर .
थोडी देर बाद ही दारोगा साहब ने देखा की चंचला देवी आकर खिड़की पर विराजी हुई हैं. दारोगा जी की छाती धड़कने लगी. तब तक देखते हैं की एक नौजवान आकर खिड़की से लगकर खडा हो गया. मुंशीजी की छाती में तूफ़ान उठ खडा हुआ. उन्होंने बन्दूक हाथ में थाम ली. अगर यह भाग गया तो सारी जासूसी धरी रह जाएगी. चोर को मौके पर नहीं पकडा तो कैसी बहादुरी. थोड़ी देर तक उस नौजवान और चंचला देवी में हंस हंस कर बातें होती रही. दारोगा साहब को तो जैसे आग लगी गयी. उन्होंने बन्दूक संभाली, तब तक उस नौजवान ने खिड़की में अपना हाथ अन्दर डआल दिया. अब दारोगा साहब से रहा नही गया. उन्होंने निशाना बांधा और कर दिया फायर. उधर गोली चली और उधर वो नौजवान कटे हुए वृक्ष की तरह नीचे जमीन पर आ गिरा.
क्रमशः .......
कथाकार - हरिमोहन झा, (रंगशाला, १९४९ से)
मूल कथा का मैथिलि से रूपांतर
कहानी का पिछला भाग यहाँ देखें
कागज़ का वह चिट लगता था आधे पर से पता हुआ, पुर्जे पर चंचला देवी का नाम भी नीचे लिखा था, उसमे कोई संदेह नहीं.
पाठको की उत्सुकता शांत करने के लिए उस चिट्ठी की नक़ल हूबहू नीचे दे रहा हूँ.
परम प्रिय
सप्रेम आलिंगन और
बारम्बार मुख चुम्बन
हम तुम्हारे आने की
प्रतीक्षा कर रहे हैं
बारह बजे रात के बाद
आप आ जाईये
हम व्याकुल हैं
रात दिन विचित्र
पागल हुई रहती
हूँ. आपको ह्रदय
से चिपकाने के लिए
कल से ही छटपटा
रही हूँ, आप से मिलने को
छाती धड़क रही है.
हम शर्म छोड़ कर लिख रही हैं
आप आकर प्राण बचाइये
मैं खिड़की पर बैठी
रहूँगी. विशेष मिलने पर
आपकी
चंचला
४/३
दारोगा साहब को जैसे तिलिस्म की चाभी हाथ लगा गयी. यत्न-पूर्वक जेब में रख लिया उस पूर्जे को. ४ मार्च की तारीख है. आज ही मिलने का वादा भी है. अब समय नहीं. चटपट करें नहीं तो हाथ में आई चिडिया फुर्र हो जाएगी. खिड़की के सामने एक घना जामुन का पेड़ था. दारोगा जी फुर्ती से चढ़ गए उसपर और बन्दूक को एक दो टहनियों वाले शाखा के साथ अडा कर बैठ गए एक मोटे से टहनी पर .
थोडी देर बाद ही दारोगा साहब ने देखा की चंचला देवी आकर खिड़की पर विराजी हुई हैं. दारोगा जी की छाती धड़कने लगी. तब तक देखते हैं की एक नौजवान आकर खिड़की से लगकर खडा हो गया. मुंशीजी की छाती में तूफ़ान उठ खडा हुआ. उन्होंने बन्दूक हाथ में थाम ली. अगर यह भाग गया तो सारी जासूसी धरी रह जाएगी. चोर को मौके पर नहीं पकडा तो कैसी बहादुरी. थोड़ी देर तक उस नौजवान और चंचला देवी में हंस हंस कर बातें होती रही. दारोगा साहब को तो जैसे आग लगी गयी. उन्होंने बन्दूक संभाली, तब तक उस नौजवान ने खिड़की में अपना हाथ अन्दर डआल दिया. अब दारोगा साहब से रहा नही गया. उन्होंने निशाना बांधा और कर दिया फायर. उधर गोली चली और उधर वो नौजवान कटे हुए वृक्ष की तरह नीचे जमीन पर आ गिरा.
क्रमशः .......
कथाकार - हरिमोहन झा, (रंगशाला, १९४९ से)
मूल कथा का मैथिलि से रूपांतर
कहानी का पिछला भाग यहाँ देखें
Wednesday, October 22, 2008
दारोगाजी की मूंछ - 1
मुंशी नौरंगीलाल को शुरू से ही जासूसी उपन्यास पढ़ने का शौक था. चन्द्रकान्ता, भूतनाथ, मायामहल, पढ़ते-पढ़ते उन्हें जासूस बनने की सनक सवार हो गयी थी. और संयोग भी ऐसा हुआ की बीए का तिलिस्म तोड़ने के बाद उन्हें काम भी वैसा ही मिल गया. नौरंगीलाल दारोगा बन गए.
दारोगा नौरंगीलाल को अपनी समझदारी का बहुत दावा था. उन्होंने कड़ी-कडी मूंछे रखी थी जिसपर वे बराबर ताव देते रहते थे. उनका सिद्धांत था की औरत जात का कोई भरोसा नहीं, इसलिए शादी-वादी का झमेला कभी नहीं उठाना चाहिए. लेकिन जब चारो ओर से काफी दवाब पडा तो वे चारो खाने चित्त हो गए. काफी ठोक-बजा कर एक सुन्दरी से उन्होंने पाणिग्रहण किया. नौरंगीलाल ख़ुद तो थे तीस से ऊपर के लेकिन कन्या थी सोलह साल की कमसिन. इसलिए जब भी वे बाहर जाते तो घर पर बाहर से ताला लगा कर साथ में चाभी ले जाते.
स्त्री-चारित्र का क्या ठिकाना. इसलिए अपने पीछे किसी बाई से भी काम करवाना उन्हें मंजूर नहीं था. क्योंकि "आदौ वेश्या ततौ दासी पश्चात भवति कुटिनी !" क्या जाने वो किसकी दूत बन कर आ जाए? इसलिए जब दारोगा साहब घर पर आते थे तभी अपने सामने बिठाकर चौका बर्तन भी करवाते थे.
नव-वधू का नाम था चंचला. वह हंसमुख और विनोदिनी थी. वैसे बंद घर में रहना उसे जेल की तरह लगता था. थोड़े दिनों बाद मुंशीजी की बहन सरयू आ गयी. तब जाकर कहीं चंचला की जान में जान आई. ननद के साथ हंसती बोलती थी. उसके बच्चे के साथ खेलती थी. खुशी खुशी वक्त कट जाता था.
परन्तु घर में इस तरह का रास-रंग दारोगा साहब को पसंद नही आया. उन्होंने दस दिन बाद ही बहन को विदा कर दिया.
फिर वही सुनसान भूतों का डेरा. चंचला को घर काटने को दौड़ता था. बाहर से ताला बंद. किससे बात करे? चुपचाप खिड़की पर अपने कर्मो को रोटी थी. जब रात में दारोगा साहब घर लौटते थे तब जाकर वह मनुष्य की दशा में लौटती थी.
एक रात चंचला ने कहा - ऐसे मन नही लगता. अपनी बहन को फिर से बुला लीजिये.
दारोगा साहब ने कहा - हूँ.
चंचला बोली - अगर आप नहीं बुलायेंगे तो मैं ही लिख भेजती हूँ .
दारोगा साहब फिर बोले - हूँ.
परन्तु उनके मन में संदेह हो गया. जरूर इसमे कोई रहस्य होगा. सत्रियशचरित्रं पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानाति कुतो: मनुष्यम.
उसी दिन से वे विशेष तौर पर और सावधान रहने लगे. चंचला की प्रत्येक गातिविधी का सूक्षम दृष्टी से विश्लेषण करने लगे.
एक रात चंचला बोल पडी - आपकी मूंछे मुझे गड़ती हैं. कटा क्यों नहीं लेते !
दारोगा साहब मूंछो पर ताव देते हुए बोले - यही मूंछ तो नौरंगीलाल की शान है. ये उसी दिन कटेंगी जिस दिन मेरी जासूसी फेल हो जाएगी.
चंचला करवट बदल कर सो गयी. लेकिन नौरंगीलाल को एक और संदेह हो गया - इसकी ऎसी इच्छा क्यों हुई.
दारोगा साहब के मन में संदेह का भूत बैठ गया. उस दिन से वे और चौकस हो गए. अब ठीक से जासूसी करनी चाहिए. ये मेरे जाने के बाद किस तरह रहती है. क्या करती है?
दूसरे दिन दारोगा साहब ने कहा - मुझे एक कोरी की तहकीकात करनी है. आज घर नहीं आऊंगा.
उस रात चंचला को नींद नहीं आई. घर पर कोई था नहीं और तिस पर जेठ की गरमी. कभी उपन्यास पढ़ती थी, कभी खिड़की पर जा बैठती थी. किसी तरह आंखों में रात गुजरी.
उधर आधी रात के बाद नौरंगीलाल वेश बदल कर अपने घर पहुंचे तो देखा कि धर्म-पत्नी खिड़की पर बैठी है. किसी की प्रतीक्षा में ऎसी तल्लीन बैठी है कि आँचल की भी सुध नहीं. आधा देह यूं ही नग्न. हूँ - सामने तो ऎसी लाजो बनी रहती है और अभी कमर से ऊपर साड़ी भी नहीं.
दारोगा साहब के संदेह ने विकराल रूप धारण कर लिया. उन्होंने दूसरे दिन गुपचुप तरीके से खिड़की की परीक्षा की. ऐसा जान पड़ता था खिड़की का एक छड़ थोडा ढीला है. कोई चाहे तो उसे उखाड़ कर अन्दर आ सकता है और फिर वापस छड़ को उसी स्थान पर लगाया जा सकता है.
दारोगा साहब ने मूंछ पर ताव दिया - हूँ ...अब सूत्र लगा है हाथ में. अगर बिना पता लगाए रहा तो मेरा नाम भी मुंशी नौरंगीलाल नहीं.
उस दिन से दारोगा साहब आधी रात बिताकर घर आने लगे. किसी न किसी दिन तो कर पकडा ही जाएगा..
क्रमश:...
मूल कथा का मैथिली से हिन्दी में रूपांतर
कथाकार - हरिमोहन झा (रंगशाला १९४९ से)
दारोगा नौरंगीलाल को अपनी समझदारी का बहुत दावा था. उन्होंने कड़ी-कडी मूंछे रखी थी जिसपर वे बराबर ताव देते रहते थे. उनका सिद्धांत था की औरत जात का कोई भरोसा नहीं, इसलिए शादी-वादी का झमेला कभी नहीं उठाना चाहिए. लेकिन जब चारो ओर से काफी दवाब पडा तो वे चारो खाने चित्त हो गए. काफी ठोक-बजा कर एक सुन्दरी से उन्होंने पाणिग्रहण किया. नौरंगीलाल ख़ुद तो थे तीस से ऊपर के लेकिन कन्या थी सोलह साल की कमसिन. इसलिए जब भी वे बाहर जाते तो घर पर बाहर से ताला लगा कर साथ में चाभी ले जाते.
स्त्री-चारित्र का क्या ठिकाना. इसलिए अपने पीछे किसी बाई से भी काम करवाना उन्हें मंजूर नहीं था. क्योंकि "आदौ वेश्या ततौ दासी पश्चात भवति कुटिनी !" क्या जाने वो किसकी दूत बन कर आ जाए? इसलिए जब दारोगा साहब घर पर आते थे तभी अपने सामने बिठाकर चौका बर्तन भी करवाते थे.
नव-वधू का नाम था चंचला. वह हंसमुख और विनोदिनी थी. वैसे बंद घर में रहना उसे जेल की तरह लगता था. थोड़े दिनों बाद मुंशीजी की बहन सरयू आ गयी. तब जाकर कहीं चंचला की जान में जान आई. ननद के साथ हंसती बोलती थी. उसके बच्चे के साथ खेलती थी. खुशी खुशी वक्त कट जाता था.
परन्तु घर में इस तरह का रास-रंग दारोगा साहब को पसंद नही आया. उन्होंने दस दिन बाद ही बहन को विदा कर दिया.
फिर वही सुनसान भूतों का डेरा. चंचला को घर काटने को दौड़ता था. बाहर से ताला बंद. किससे बात करे? चुपचाप खिड़की पर अपने कर्मो को रोटी थी. जब रात में दारोगा साहब घर लौटते थे तब जाकर वह मनुष्य की दशा में लौटती थी.
एक रात चंचला ने कहा - ऐसे मन नही लगता. अपनी बहन को फिर से बुला लीजिये.
दारोगा साहब ने कहा - हूँ.
चंचला बोली - अगर आप नहीं बुलायेंगे तो मैं ही लिख भेजती हूँ .
दारोगा साहब फिर बोले - हूँ.
परन्तु उनके मन में संदेह हो गया. जरूर इसमे कोई रहस्य होगा. सत्रियशचरित्रं पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानाति कुतो: मनुष्यम.
उसी दिन से वे विशेष तौर पर और सावधान रहने लगे. चंचला की प्रत्येक गातिविधी का सूक्षम दृष्टी से विश्लेषण करने लगे.
एक रात चंचला बोल पडी - आपकी मूंछे मुझे गड़ती हैं. कटा क्यों नहीं लेते !
दारोगा साहब मूंछो पर ताव देते हुए बोले - यही मूंछ तो नौरंगीलाल की शान है. ये उसी दिन कटेंगी जिस दिन मेरी जासूसी फेल हो जाएगी.
चंचला करवट बदल कर सो गयी. लेकिन नौरंगीलाल को एक और संदेह हो गया - इसकी ऎसी इच्छा क्यों हुई.
दारोगा साहब के मन में संदेह का भूत बैठ गया. उस दिन से वे और चौकस हो गए. अब ठीक से जासूसी करनी चाहिए. ये मेरे जाने के बाद किस तरह रहती है. क्या करती है?
दूसरे दिन दारोगा साहब ने कहा - मुझे एक कोरी की तहकीकात करनी है. आज घर नहीं आऊंगा.
उस रात चंचला को नींद नहीं आई. घर पर कोई था नहीं और तिस पर जेठ की गरमी. कभी उपन्यास पढ़ती थी, कभी खिड़की पर जा बैठती थी. किसी तरह आंखों में रात गुजरी.
उधर आधी रात के बाद नौरंगीलाल वेश बदल कर अपने घर पहुंचे तो देखा कि धर्म-पत्नी खिड़की पर बैठी है. किसी की प्रतीक्षा में ऎसी तल्लीन बैठी है कि आँचल की भी सुध नहीं. आधा देह यूं ही नग्न. हूँ - सामने तो ऎसी लाजो बनी रहती है और अभी कमर से ऊपर साड़ी भी नहीं.
दारोगा साहब के संदेह ने विकराल रूप धारण कर लिया. उन्होंने दूसरे दिन गुपचुप तरीके से खिड़की की परीक्षा की. ऐसा जान पड़ता था खिड़की का एक छड़ थोडा ढीला है. कोई चाहे तो उसे उखाड़ कर अन्दर आ सकता है और फिर वापस छड़ को उसी स्थान पर लगाया जा सकता है.
दारोगा साहब ने मूंछ पर ताव दिया - हूँ ...अब सूत्र लगा है हाथ में. अगर बिना पता लगाए रहा तो मेरा नाम भी मुंशी नौरंगीलाल नहीं.
उस दिन से दारोगा साहब आधी रात बिताकर घर आने लगे. किसी न किसी दिन तो कर पकडा ही जाएगा..
क्रमश:...
मूल कथा का मैथिली से हिन्दी में रूपांतर
कथाकार - हरिमोहन झा (रंगशाला १९४९ से)
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