Showing posts with label हिन्दी. Show all posts
Showing posts with label हिन्दी. Show all posts

Monday, October 13, 2008

सैन्य न्यायाधिकरण में छिड़ा हिंदी और अंग्रेजी का विवाद

नई दुनिया से साभार

सैन्य बलों के लिए अभी न्यायाधिकरण गठित भी नहीं हुआ है कि इसमें हिंदी और अंग्रेजी की भाषा समेत कई विवाद और अडचनें पैदा हो गई हैं और रक्षा मंत्री एके एंटनी की यह महत्वकांक्षी परियोजना अधर में झूल रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार न्यायाधिकरण में बहस इस मुद्दे पर है कि सैन्य बलों के कर्मियों को यदि खुद पैरवी का अवसर देना है तो इसके लिए हिंदी में सुनवाई होनी चाहिए ताकि जवान अपने मामले में अपना पक्ष खुद पेश कर सकें। लेकिन इसके विरोध में दो तर्क हैं। एक तो यह कि हाईकोर्ट के स्तर के मामले इस न्यायाधिकरण में आएंगे और कानूनी शब्दावली को हिंदी में ढालने और उसी भाषा में जिरह करने में बेहद कठिनाई का सामना करना प़ड़ सकता है।

सूत्रों के अनुसार दूसरा तर्क यह है कि न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ नई दिल्ली में स्थापित होने के अलावा चेन्नाई, कोच्चि, कोलकाता और गुवाहाटी जैसी क्षेत्रीय पीठ में कौन सी भाषा अपनाई जाएगी जहां के जवानों की मातृभाषा हिंदी नहीं है। न्यायाधिकरण की क्षेत्रीय पीठें लखनऊ. चंडीग़ढ़, जयपुर और मुंबई में भी होनी है। सैन्य न्यायाधिकरण का गठन ।५ अगस्त तक हो जाना था लेकिन कई बाधाओं के कारण यह अधर में झूलता जा रहा है। न्यायमूर्ति एके माथुर को न्यायाधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया जा चुका है लेकिन अभी इसके न्यायिक एवं प्रशासनिक सदस्यों तथा गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई है।

सूत्रों के अनुसार गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कानून और रक्षा मंत्रालय में खींचतान है। कानून मंत्रालय का कहना है कि इन सदस्यों की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया से होनी चाहिए जबकि रक्षा मंत्रालय स्वयं ये नियुक्तियां करना चाहता है। समझा जाता है कि रक्षा मंत्री ने इन सदस्यों के लिए जितने पद नौ पीठों के लिए मांगे थे उनमें से ५० प्रतिशत कटौती वित्त मंत्रालय ने कर दी है।नई दिल्ली (वार्ता)। सैन्य बलों के लिए अभी न्यायाधिकरण गठित भी नहीं हुआ है कि इसमें हिंदी और अंग्रेजी की भाषा समेत कई विवाद और अडचनें पैदा हो गई हैं और रक्षा मंत्री एके एंटनी की यह महत्वकांक्षी परियोजना अधर में झूल रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार न्यायाधिकरण में बहस इस मुद्दे पर है कि सैन्य बलों के कर्मियों को यदि खुद पैरवी का अवसर देना है तो इसके लिए हिंदी में सुनवाई होनी चाहिए ताकि जवान अपने मामले में अपना पक्ष खुद पेश कर सकें। लेकिन इसके विरोध में दो तर्क हैं। एक तो यह कि हाईकोर्ट के स्तर के मामले इस न्यायाधिकरण में आएंगे और कानूनी शब्दावली को हिंदी में ढालने और उसी भाषा में जिरह करने में बेहद कठिनाई का सामना करना प़ड़ सकता है।

सूत्रों के अनुसार दूसरा तर्क यह है कि न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ नई दिल्ली में स्थापित होने के अलावा चेन्नाई, कोच्चि, कोलकाता और गुवाहाटी जैसी क्षेत्रीय पीठ में कौन सी भाषा अपनाई जाएगी जहां के जवानों की मातृभाषा हिंदी नहीं है। न्यायाधिकरण की क्षेत्रीय पीठें लखनऊ. चंडीग़ढ़, जयपुर और मुंबई में भी होनी है। सैन्य न्यायाधिकरण का गठन ।५ अगस्त तक हो जाना था लेकिन कई बाधाओं के कारण यह अधर में झूलता जा रहा है। न्यायमूर्ति एके माथुर को न्यायाधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया जा चुका है लेकिन अभी इसके न्यायिक एवं प्रशासनिक सदस्यों तथा गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई है।

सूत्रों के अनुसार गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कानून और रक्षा मंत्रालय में खींचतान है। कानून मंत्रालय का कहना है कि इन सदस्यों की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया से होनी चाहिए जबकि रक्षा मंत्रालय स्वयं ये नियुक्तियां करना चाहता है। समझा जाता है कि रक्षा मंत्री ने इन सदस्यों के लिए जितने पद नौ पीठों के लिए मांगे थे उनमें से ५० प्रतिशत कटौती वित्त मंत्रालय ने कर दी है।

समाचार सौजन्य: हिन्दी दैनिक "नई दुनिया" नयी दिल्ली अंक 13 अक्तूबर 2008