Sunday, December 07, 2008

नए सिंगूरों की तैयारी


झारखण्ड में विगत कुछ वर्षों से बहुत से औद्योगिक घरानों की कई परियोजनाएं लंबित पडी है. राज्य सरकार के पास भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं क्षतिपूर्ती की कोई ठोस योजना नहीं होने की वजह से राज्य में जहाँ तहां विरोध प्रदर्शन आक्रोश का रूप लेता जा रहा है. मित्तल, टाटा, जिंदल, को पिछले दो एक वर्षों में उग्र आदिवासी प्रदर्शनों का सामना करना पडा है. इस कडी में कल दुमका के काठीडीह में जहाँ एक बिजली परियोजना प्रस्तावित है, ग्रामीण लोग उचित मुआवजा दिए जाने एवं उस क्षेत्र के कुछ गिरफ्तार ग्रामीणों को रिहा किए जाने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जमा हो रहे थे जिन्हें रोकने के लिए पुलिस ने कोशिश की तो ग्रामीण उग्र हो गए. इस सिलसिले में आंसू गैस इत्यादि के प्रभावहीन होने के बाद पुलिस फायरिंग में कम से कम से कम चार लोगों की मौत हो गयी है और दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हैं.

Tuesday, December 02, 2008

मिशिगन विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा

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मिशिगन विश्वविद्यालय प्रशाशन एवं कुछ छात्र संगठनों द्बारा कल मुंबई की आंतकवादी घटना में दिवंगत हुए लोगों के लिए एक श्रद्धांजलि सभा रखी गयी थी. रात नौ से दस तक चले इस सभा में कडाके की ठंढ एवं बर्फबारी के बावजूद तकरीबन ढाई-तीन सौ लोग एक घंटे तक बाहर खड़े रहकर एवं मोमबत्तियां प्रजवलित कर दिवंगत लोगों की सदगति के लिए प्रार्थना की. हर धर्म एवं राष्ट्रीयता के लोगों ने काफी भावुकता से उन सब लोगों को याद किया जो अब हमारे बीच नहीं हैं और आतंकवाद का मुकाबला करने का अपना संकल्प दुहराया


Tuesday, November 18, 2008

ऐश्वर्य की दुनिया में ऐसे लोग भी !

वैसे मैं जॉन अब्राहम के बारे में कुछ ख़ास तो नहीं जानता सिवाय इसके कि वे एक अच्छे कलाकार और मॉडल हैं. और हाँ ये भी के विपाशा और जॉन का टांका लगा लेकिन अभी बीबीसी हिन्दी पर ये देखा (जो निचे लिखा है) तो दंग रह गया कि इस माया-नगरी में जहाँ लोग चाहते की अक्खा मुंबई अपुन की हो जाय जॉन जैसा भी कोई धन्ना सेठ होगा जो .... खैर,इतना महंगा कलाकार और इतनी सादगी. भाई मैं तो मुरीद हो गया जॉन का...
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जॉन अब्राहम का घर कितना बड़ा है? सोचिए. पाँच हज़ार वर्ग फ़ीट? चार हजार या तीन हज़ार? या शायद दो हज़ार वर्ग फ़ीट? नहीं सिर्फ़ 200 वर्ग फ़ीट. जी हाँ, आपने सही पढ़ा. बैंड स्टैंड, ब्रांदा में उनका घर सिर्फ़ एक कमरे का 200 वर्ग फ़ीट क्षेत्र में है. उसी कमरे में एक तरफ बाथरूम है तो दूसरी ओर रसोईघर. रूम के साथ एक बालकनी है और पीछे एक छोटा सा टेरेस है. घर बहुत अच्छा बना हुआ है. जॉन के पिताजी और भाई आर्किटेक्ट हैं और उन दोनों ने वो घर बनाया है. कमरे में पलंग भी नहीं है. सिर्फ़ सोफासेट है. एक बड़े सोफ़े पर जॉन सोते हैं. नहीं जनाब, अब ये मत सोचिएगा कि आर्थिक मंदी की वजह से जॉन पैसे बचा रहे हैं.

जॉन को ऐसे ही रहना पसंद हैं. जिस बिल्डिंग में उनका टेरेस फ़्लैट है, उसी बिल्डिंग में उनका एक और घर है, जिसकी वो मरम्मत करवा रहे हैं.

लेकिन उसमें वे ख़ुद नहीं रहेंगे. अपने मम्मी-डैडी और भाई-भाभी के लिए जॉन उस घर को तैयार कर रहे हैं. जॉन की तरह उनके परिवार के सदस्य भी बहुत साधारण हैं.

उनके मम्मी-पापा और भाई-भाभी अब भी कभी-कभी बसों या ट्रेन में सफ़र करते हैं. जॉन बताते हैं- मेरे भाई तो मेरी पुरानी शर्ट भी पहनते हैं. वो मुझे मेरे पुराने कपड़े फेंकने नहीं देते.
खबर : बीबीसी हिन्दी वेबसाइट के सौजन्य से

Friday, November 14, 2008

चाँद पर तिरंगा

तिरंगे के चाहने वाले सभी को बधाईयाँ
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सौजन्य - सीएनएन-आई बी एन

Tuesday, November 04, 2008

शिव सेना पर चुटकी

यूँ वंशवाद की पुरोधा तो हमारी कांग्रेस है, बहुत से अन्य दल भी पीछे नहीं हैं लेकिन आज नई दुनिया के दिल्ली संस्करण में शिवसेना पर ली गयी चुटकी मजेदार है:

Thursday, October 30, 2008

दूसरों की मातृभाषा का अनादर न करें – अमिताभ बच्चन

 

मुंबई। हिन्दी में ब्लॉग लिखने को लेकर मिलीजुली प्रतिक्रिया से
रूबरू हो रहे महानायक अमिताभ बच्चन ने साफ किया है कि वे अपनी भावनाएँ मातृभाषा में
व्यक्त करने से नहीं हिचकेंगे।


श्री बच्चन मातृभाषा के प्रति उद्गार व्यक्त
करते हुए ब्लॉग में लिखते हैं - "यदि मुझे अपनी भावनाएँ मातृभाषा में व्यक्त करने
का अवसर मिलता है तो मैं ऐसा करने से नहीं हिचकूँगा। भले ही उसे कोई पढ़े या न पढ़े।
मैंने हमेशा ही अपने जीवन और व्यवहार में संतुलन बनाए रखा है। यह आगे भी बना
रहेगा।" उन्होंने लिखा है - हम कभी भी अन्य लोगों की मातृभाषा का अनादर नहीं करें
और न ही उनके विश्वास और महत्व का। मेरे हिन्दी में लिखने को लेकर आप में से कई
लोगों को विस्मय हो सकता है। कुछ लोग इसका अनुवाद चाहते हैं और कुछ ने तो ब्लॉग
पढ़ना छोड़ देने तक की चेतावनी दी है। जबकि कुछ पाठकों ने हिन्दी में लिखने के लिए
आभार भी जताया है। इनमें अहिन्दी भाषिक भी हैं, जिनका हिन्दी से कोई परिचय नहीं है।


कुछ नहीं छूट रहा

उन्होंने अहिन्दी भाषी पाठकों को आश्वस्त करते हुए
कहा कि निष्पक्ष भाव बनाए रखने के लिए निश्चित रूप से पुनरावृत्ति होगी। कथ्य समान
रहेंगे। इससे उन्हें आशा है कि सभी चर्चा और आशंकाएँ समाप्त हो जाएँगी। उन्होंने
कहा कि जो कुछ हिन्दी में कहा गया है, वह पहले अंग्रेजी में आ चुका है। इसलिए
पाठकों से कुछ नहीं छूटेगा।


छोड़ना चाहें तो आपकी मर्जी

उन्होंने
कहा- "आप सभी अपनी इच्छा से मेरे ब्लॉग पर आते हैं। मैं आपकी उपस्थिति का मजा उठाता
हूँ। आपकी प्रशंसा और आलोचनाओं को मैं लोकतांत्रिक तरीके से लेता हूँ। फिर भी यदि
आप मेरा ब्लॉग छोड़कर जाना चाहते हैं तो मैं आपको रोकने वाला कौन होता हूँ।"

(दैनिक 'नयी दुनिया के 30 अक्तूबर (जबलपुर संस्करण) से साभार)

Tuesday, October 28, 2008

रोडसाइड रोमियो - कुतवन लोग का मूभी

इसका ट्रेलर देखा रहा, पहिले लगा रहा कि दू गो बडका-बडका फिलम बनाने बाला सब लगे हुए है इसमे, उ का कहते है जहे से कि यश चोपडा , राज चोपडा का कम्पनी यशराज फिलम कंपनी और मिकी माउस वालन सब तो फिलम अच्छा ही बनेगा. पर एही उम्मीद में जब मूभी रीलिज हुआ तो सबसे पहिले डीवीडी खरीद के देख लिहिस. पर इ तो सचमुच कुकूर लोग का मूभी है. सैफवा और करीनवा दोनों इसमे कुकूर बने हैं और जम के कुकुरई किए हैं. गाना पे गाना ठेले हैं जम के लेकिन कुकुरन का नाम पूरा मिटटी में मिलाई दिए हैं. औ ऊ का कहते हैं कि इसमे गबरवा "अन्ना" जादा अच्छा काम किया है इसमे. बचवन लोग को ई मूभी कभी नही दिखाने का.

Saturday, October 25, 2008

दारोगा जी की मूंछ - ३

दारोगाजी मूंछों पर ताव देते हुए वहाँ पहुँचे तो देखते हैं कि वहाँ कुहराम मचा हुआ है। चंचला देवी खिड़की की छड़ से अपना सर फोड़ने पर तुली हुई है।
मुंशीजी को देखकर चंचला जोर-जोर से विलाप करने लगी - मेरे भाई से आपकी क्या दुश्मनी थी जो आपने उन्हें गोली मार दी?
मुंशीजी ने डाँटकर कहा - अब ये तिरिया चरित्तर रहने दो। ये तुम्हार भाई नहीं यार है !
चंचला देवी रोती हुई बोली - हे राम ! आप पागल तो नहीं हो गए। आंख है या नहीं। बिरजू भैया को नहीं पहचानते आप। हाय ! हाय ! कैसे छटपटा रहे हैं। मैं तो बंद हूँ। पानी भी कैसे दूँ उनको? पता नहीं उनको भी क्या पड़ी थी ऐसी जगह आने की।
अब मुंशीजी ने अपना टॉर्च प्रकाशमान किया तो अपने साले ब्रजनाथ को देखकर हतबुद्धि हो गये। तब तक मुहल्ले के लोग भी जमा हो गये। ब्रजनाथ को पानी पिलाकर होश में लाया गया और तुरन्त डॉक्टर को बुलाकर मरहम-पट्टी की गयी। गोली पैर में लगी थी, जान बच गयी।
दारोगा साहब सबको यही कहते फिर रहे थे, चोर समझ कर धोखा खा गया। थाने से आ रहा था। अंधेरे में रात के समय खिड़की के पास खड़ा देखा, लगा कोई खिड़की का छड़ काट रहा है, गोली चला दी मैंने।
सबके चले जाने के बाद, चंचला देवी लगी उनसे कहने, दुर ! आपकी बुद्धि भी कैसी हो गयी है। मैं तो बिरजू भैया की आवाज़ सुनकर दौड़ी थी, परंतु बाहर से तो ताला बंद था। उनको प्यास लगी थी। मैं एक गिलास पानी दे रही थी। वो हाथ बढाकर पानी लेने ही लगे थे कि आपने गोली मार दी। हाय राम ! हमलोगों ने ना जाने क्या कुसूर किया था।
मुंशीजी बोले - मेरे पास ज्यादा सत्यवंती मत बनो। ये तो संयोग था कि तुम्हारे भाई साहब बीच में आ गये, नहीं तो तुम्हारे यार की लाश यहाँ तड़प रही होती।
स्त्री ने कहा - आप तो बिल्कुल पागल हो गये हैं। मेरा यार कौन होगा?
मुंशीजी ने कहा - जिसको आज रात तुमने बुलाया था।
चंचला देवी का चेहरा फक हो गया। अचकचा कर पूछा - मैंने बुलाया था?
मुंशीजी - हाँ, बुलाया था। चिट्ठी लिखकर।
चंचला ने पूछा - आप साबित कर सकते हैं?
मुंशीजी ने जेब से चिट बाहर निकाल कर उसके सामने रख दिया। जैसे शिकार फंसने पर बहेलिया खुश होता है वैसे ही वे अपनी मूंछों पर ताव देने लगे।
एकाएक चंचला देवी के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी। उसने पूछा - ये चिट्ठी आपको कहाँ मिली?
मुंशीजी ने अपनी मूंछों पर मरोड़ देते हुए कहा - पिछवाड़े की नाली के पास।
चंचला देवी ने कहा - ये चिट्ठी तो मैंने आपकी बहन को लिखा था। बाद में फाड़ कर फेक दिया। वहीं जाकर खोजिए, इसका दूसरा टुकड़ा भी वहीं कहीं होगा।
जासूसराम फिर से टॉर्च लेकर गये और वैसा ही एक दूसरा टुकड़ा ढूँढ कर ले आये।
चंचला देवी ने कहा - अब दोनों टुकड़ा जोड़कर देखिये जरा।
दोनो टुकड़े जोड़े गये तो पूरी चिट्ठी इस तरह पढी गयी।

परम प्रिय
छोटी दीदी
सप्रेम आलिंगन एवं
स्नेहमयी बच्ची को
बारंबार मुख चुम्बन।
आप कब आएँगी?
मैं आपके आने का
समाचार सुन प्रतिदिन
इंतज़ार कर रही हूँ।
आपके भाई आजकल
बारह बजे रात के बाद
घर आया करते हैं।
आप आ जाइए।
तब सब समझ आएगा।
हम व्याकुल हैं।
आपके भाई साहब
रात दिन विचित्र
संदेह के फेर में
पागल हुए रहते हैं।
लिख नहीं सकती।
आपको दिल
की व्यथा क्या कहूँ। लिफाफ
में चिपकाने के लिए
टिकट नहीं था। इसलिए
कल से छटपटा
रही थी। आज लगा
रही हूँ। आपसे मिलने को
हम व्यग्र हैं। चिन्ता से
छाती धड़क रही है।
कहूँ भी किससे?
लाज छोड़कर लिखती हूं
उन्हें मुझपर ही संदेह है।
आकर प्राण बचाइये।
हर ट्रेन के समय
खिड़की पर बैठी हुई
रहती हूँ। पता नहीं कब
मिलूँगी। विशेष मिलने पर
कहूँगी
आपकी
भाभी
चंचला
देवी
४/३
१९४८

चिट्ठी पढते ही मुंशीजी शर्म से पानी पानी हो गये। बोले - तो अब क्या होना चाहिए?
चंचला देवी चुपचाप उठ कर गयी और शेविंग सेट ले आयी। तब साबुन से ब्रश को भिगा-भिगाकर मूँछों को खूब जोर-जोर से रगड़ कर उसपर धीरे धीरे रेजर चलाने लगी। देखते-देखते दारोगा साहब की मूँछ साफ हो गयी।

समाप्त।

कथाकार - हरिमोहन झा (रंगशाला १९४९ से)
मैथिली से रूपांतरित

Friday, October 24, 2008

दारोगाजी की मूंछ - २

और एक दिन अचानक ही मुंशी नौरंगीलाल की जासूसी रंग लाई. करीब रात के बारह बजे वे रात के अंधेरे में अपने घर के पिछवाडे में खड़े हो गए. कर की तरह कान लगाए हुए थे, इधर-उधर कुछ सुनने के लिए कान लगाए हुए. तबतक उनकी नज़र मोड़-माड कर फेके गए कागज़ के टुकड़े पर पडी . उन्होंने लपक कर कागज़ का वो टुकडा उठाया और टॉर्च की रौशनी में लगे पढने उसे. पढ़ते-पढ़ते दारोगा साहब ने मूंछ पर ताव दिया और खुशी से उचल पड़े - वो मारा! पकड़ लिया चोर.

कागज़ का वह चिट लगता था आधे पर से पता हुआ, पुर्जे पर चंचला देवी का नाम भी नीचे लिखा था, उसमे कोई संदेह नहीं.

पाठको की उत्सुकता शांत करने के लिए उस चिट्ठी की नक़ल हूबहू नीचे दे रहा हूँ.
परम प्रिय
सप्रेम आलिंगन और
बारम्बार मुख चुम्बन
हम तुम्हारे आने की
प्रतीक्षा कर रहे हैं
बारह बजे रात के बाद
आप आ जाईये
हम व्याकुल हैं
रात दिन विचित्र
पागल हुई रहती
हूँ. आपको ह्रदय
से चिपकाने के लिए
कल से ही छटपटा
रही हूँ, आप से मिलने को
छाती धड़क रही है.
हम शर्म छोड़ कर लिख रही हैं
आप आकर प्राण बचाइये
मैं खिड़की पर बैठी
रहूँगी. विशेष मिलने पर
आपकी
चंचला
४/३

दारोगा साहब को जैसे तिलिस्म की चाभी हाथ लगा गयी. यत्न-पूर्वक जेब में रख लिया उस पूर्जे को. ४ मार्च की तारीख है. आज ही मिलने का वादा भी है. अब समय नहीं. चटपट करें नहीं तो हाथ में आई चिडिया फुर्र हो जाएगी. खिड़की के सामने एक घना जामुन का पेड़ था. दारोगा जी फुर्ती से चढ़ गए उसपर और बन्दूक को एक दो टहनियों वाले शाखा के साथ अडा कर बैठ गए एक मोटे से टहनी पर .

थोडी देर बाद ही दारोगा साहब ने देखा की चंचला देवी आकर खिड़की पर विराजी हुई हैं. दारोगा जी की छाती धड़कने लगी. तब तक देखते हैं की एक नौजवान आकर खिड़की से लगकर खडा हो गया. मुंशीजी की छाती में तूफ़ान उठ खडा हुआ. उन्होंने बन्दूक हाथ में थाम ली. अगर यह भाग गया तो सारी जासूसी धरी रह जाएगी. चोर को मौके पर नहीं पकडा तो कैसी बहादुरी. थोड़ी देर तक उस नौजवान और चंचला देवी में हंस हंस कर बातें होती रही. दारोगा साहब को तो जैसे आग लगी गयी. उन्होंने बन्दूक संभाली, तब तक उस नौजवान ने खिड़की में अपना हाथ अन्दर डआल दिया. अब दारोगा साहब से रहा नही गया. उन्होंने निशाना बांधा और कर दिया फायर. उधर गोली चली और उधर वो नौजवान कटे हुए वृक्ष की तरह नीचे जमीन पर आ गिरा.

क्रमशः .......

कथाकार - हरिमोहन झा, (रंगशाला, १९४९ से)

मूल कथा का मैथिलि से रूपांतर

कहानी का पिछला भाग यहाँ देखें

रोडसाइड रोमियो

लगता है हिन्दी एनीमेशन फिल्मों का नया ज़माना आने वाला है. यशराज फिल्म्स और वौल्ट डिज्नी के सहयोग से बनने वाली रोडसाइड रोमियो फिल्म का ट्रेलर देखकर तो यही लगता है.

Wednesday, October 22, 2008

दारोगाजी की मूंछ - 1

मुंशी नौरंगीलाल को शुरू से ही जासूसी उपन्यास पढ़ने का शौक था. चन्द्रकान्ता, भूतनाथ, मायामहल, पढ़ते-पढ़ते उन्हें जासूस बनने की सनक सवार हो गयी थी. और संयोग भी ऐसा हुआ की बीए का तिलिस्म तोड़ने के बाद उन्हें काम भी वैसा ही मिल गया. नौरंगीलाल दारोगा बन गए.
दारोगा नौरंगीलाल को अपनी समझदारी का बहुत दावा था. उन्होंने कड़ी-कडी मूंछे रखी थी जिसपर वे बराबर ताव देते रहते थे. उनका सिद्धांत था की औरत जात का कोई भरोसा नहीं, इसलिए शादी-वादी का झमेला कभी नहीं उठाना चाहिए. लेकिन जब चारो ओर से काफी दवाब पडा तो वे चारो खाने चित्त हो गए. काफी ठोक-बजा कर एक सुन्दरी से उन्होंने पाणिग्रहण किया. नौरंगीलाल ख़ुद तो थे तीस से ऊपर के लेकिन कन्या थी सोलह साल की कमसिन. इसलिए जब भी वे बाहर जाते तो घर पर बाहर से ताला लगा कर साथ में चाभी ले जाते.
स्त्री-चारित्र का क्या ठिकाना. इसलिए अपने पीछे किसी बाई से भी काम करवाना उन्हें मंजूर नहीं था. क्योंकि "आदौ वेश्या ततौ दासी पश्चात भवति कुटिनी !" क्या जाने वो किसकी दूत बन कर आ जाए? इसलिए जब दारोगा साहब घर पर आते थे तभी अपने सामने बिठाकर चौका बर्तन भी करवाते थे.
नव-वधू का नाम था चंचला. वह हंसमुख और विनोदिनी थी. वैसे बंद घर में रहना उसे जेल की तरह लगता था. थोड़े दिनों बाद मुंशीजी की बहन सरयू आ गयी. तब जाकर कहीं चंचला की जान में जान आई. ननद के साथ हंसती बोलती थी. उसके बच्चे के साथ खेलती थी. खुशी खुशी वक्त कट जाता था.
परन्तु घर में इस तरह का रास-रंग दारोगा साहब को पसंद नही आया. उन्होंने दस दिन बाद ही बहन को विदा कर दिया.
फिर वही सुनसान भूतों का डेरा. चंचला को घर काटने को दौड़ता था. बाहर से ताला बंद. किससे बात करे? चुपचाप खिड़की पर अपने कर्मो को रोटी थी. जब रात में दारोगा साहब घर लौटते थे तब जाकर वह मनुष्य की दशा में लौटती थी.
एक रात चंचला ने कहा - ऐसे मन नही लगता. अपनी बहन को फिर से बुला लीजिये.
दारोगा साहब ने कहा - हूँ.
चंचला बोली - अगर आप नहीं बुलायेंगे तो मैं ही लिख भेजती हूँ .
दारोगा साहब फिर बोले - हूँ.
परन्तु उनके मन में संदेह हो गया. जरूर इसमे कोई रहस्य होगा. सत्रियशचरित्रं पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानाति कुतो: मनुष्यम.
उसी दिन से वे विशेष तौर पर और सावधान रहने लगे. चंचला की प्रत्येक गातिविधी का सूक्षम दृष्टी से विश्लेषण करने लगे.
एक रात चंचला बोल पडी - आपकी मूंछे मुझे गड़ती हैं. कटा क्यों नहीं लेते !
दारोगा साहब मूंछो पर ताव देते हुए बोले - यही मूंछ तो नौरंगीलाल की शान है. ये उसी दिन कटेंगी जिस दिन मेरी जासूसी फेल हो जाएगी.
चंचला करवट बदल कर सो गयी. लेकिन नौरंगीलाल को एक और संदेह हो गया - इसकी ऎसी इच्छा क्यों हुई.
दारोगा साहब के मन में संदेह का भूत बैठ गया. उस दिन से वे और चौकस हो गए. अब ठीक से जासूसी करनी चाहिए. ये मेरे जाने के बाद किस तरह रहती है. क्या करती है?
दूसरे दिन दारोगा साहब ने कहा - मुझे एक कोरी की तहकीकात करनी है. आज घर नहीं आऊंगा.
उस रात चंचला को नींद नहीं आई. घर पर कोई था नहीं और तिस पर जेठ की गरमी. कभी उपन्यास पढ़ती थी, कभी खिड़की पर जा बैठती थी. किसी तरह आंखों में रात गुजरी.
उधर आधी रात के बाद नौरंगीलाल वेश बदल कर अपने घर पहुंचे तो देखा कि धर्म-पत्नी खिड़की पर बैठी है. किसी की प्रतीक्षा में ऎसी तल्लीन बैठी है कि आँचल की भी सुध नहीं. आधा देह यूं ही नग्न. हूँ - सामने तो ऎसी लाजो बनी रहती है और अभी कमर से ऊपर साड़ी भी नहीं.
दारोगा साहब के संदेह ने विकराल रूप धारण कर लिया. उन्होंने दूसरे दिन गुपचुप तरीके से खिड़की की परीक्षा की. ऐसा जान पड़ता था खिड़की का एक छड़ थोडा ढीला है. कोई चाहे तो उसे उखाड़ कर अन्दर आ सकता है और फिर वापस छड़ को उसी स्थान पर लगाया जा सकता है.
दारोगा साहब ने मूंछ पर ताव दिया - हूँ ...अब सूत्र लगा है हाथ में. अगर बिना पता लगाए रहा तो मेरा नाम भी मुंशी नौरंगीलाल नहीं.
उस दिन से दारोगा साहब आधी रात बिताकर घर आने लगे. किसी न किसी दिन तो कर पकडा ही जाएगा..


क्रमश:...


मूल कथा का मैथिली से हिन्दी में रूपांतर
कथाकार - हरिमोहन झा (रंगशाला १९४९ से)

कुछ इश्क किया कुछ काम किया

वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे
जो इशक को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया

काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

(फैज अहमद फैज - 1976)

Monday, October 20, 2008

जिम की जीवटता को सलाम

मैं उतना ही ज़िंदा हूँ जितना कोई भी इस संसार में जीवित है।

- जिम मैकलॉरेन


43 वर्षीय जिम मैकलॉरेन जिनको मौत दो बार काफी करीब से छूकर निकली किसी भी व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हो सकते हैं। जिम जैसी दो दुर्घटनाओं से बचकर निकला कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से ज़िंदगी से हारकर अपने हथियार डाल सकता है एवं दूसरों की दया पर आश्रित होना उसकी नियति बन सकती है। परंतु जिम न केवल आज एक अत्यंत सफल व्यक्ति हैं बल्कि दूसरों को भी अपनी रोशनी से सराबोर कर रहे हैं।
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Sunday, October 19, 2008

राज ठाकरे मनोरोगी नही है

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लालू प्रसाद यादव का कहना है कि राज ठाकरे मनोरोगी हैं। ये बयान उस क्रम में आया है जब रेलवे के द्वारा मुंबई के विभिन्न परीक्षा केंद्रो पर आयोजित एक नियुक्ति परीक्षा मे महाराष्ट्र से बाहर से आये परीक्षार्थियों को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के तथाकथित कार्यकर्ताओं ने खदेड़-खदेड़ कर पीटा। बिहार और उत्तर प्रदेश से संबद्ध विभिन्न दलों के नेताओं ने इस घटना पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी है। ये कोई पहली बार नहीं हो रहा है कि "मनसे" के इन आतंकवादी कार्यकर्ताओं ने बिहार-उत्तर प्रदेश के लोगों को आतंकित करने का प्रयास किया है। तुर्रा यह कि हमारी मीडिया ऐसी हरकतें करने वालों को "एक्टीविस्ट" कहकर संबोधित करती है। ठाकरे दरअसल न तो मनोरोगी हैं जैसा कि लालूजी मानते हैं और न ही "मराठी मानुष" के भलाई की उनमें कोई दिली इच्छा है, वे बस उन्हीं हथकंडों पर काम कर रहे हैं जिनपर बिहारी नेता अपनी राजनीति चमकाने की जुगत में लगे रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि राज ठाकरे क्षेत्रवाद को हवा देना चाहते हैं तो बिहारी नेता जातिवाद की रोटियाँ सेकते हैं।

Monday, October 13, 2008

सैन्य न्यायाधिकरण में छिड़ा हिंदी और अंग्रेजी का विवाद

नई दुनिया से साभार

सैन्य बलों के लिए अभी न्यायाधिकरण गठित भी नहीं हुआ है कि इसमें हिंदी और अंग्रेजी की भाषा समेत कई विवाद और अडचनें पैदा हो गई हैं और रक्षा मंत्री एके एंटनी की यह महत्वकांक्षी परियोजना अधर में झूल रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार न्यायाधिकरण में बहस इस मुद्दे पर है कि सैन्य बलों के कर्मियों को यदि खुद पैरवी का अवसर देना है तो इसके लिए हिंदी में सुनवाई होनी चाहिए ताकि जवान अपने मामले में अपना पक्ष खुद पेश कर सकें। लेकिन इसके विरोध में दो तर्क हैं। एक तो यह कि हाईकोर्ट के स्तर के मामले इस न्यायाधिकरण में आएंगे और कानूनी शब्दावली को हिंदी में ढालने और उसी भाषा में जिरह करने में बेहद कठिनाई का सामना करना प़ड़ सकता है।

सूत्रों के अनुसार दूसरा तर्क यह है कि न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ नई दिल्ली में स्थापित होने के अलावा चेन्नाई, कोच्चि, कोलकाता और गुवाहाटी जैसी क्षेत्रीय पीठ में कौन सी भाषा अपनाई जाएगी जहां के जवानों की मातृभाषा हिंदी नहीं है। न्यायाधिकरण की क्षेत्रीय पीठें लखनऊ. चंडीग़ढ़, जयपुर और मुंबई में भी होनी है। सैन्य न्यायाधिकरण का गठन ।५ अगस्त तक हो जाना था लेकिन कई बाधाओं के कारण यह अधर में झूलता जा रहा है। न्यायमूर्ति एके माथुर को न्यायाधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया जा चुका है लेकिन अभी इसके न्यायिक एवं प्रशासनिक सदस्यों तथा गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई है।

सूत्रों के अनुसार गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कानून और रक्षा मंत्रालय में खींचतान है। कानून मंत्रालय का कहना है कि इन सदस्यों की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया से होनी चाहिए जबकि रक्षा मंत्रालय स्वयं ये नियुक्तियां करना चाहता है। समझा जाता है कि रक्षा मंत्री ने इन सदस्यों के लिए जितने पद नौ पीठों के लिए मांगे थे उनमें से ५० प्रतिशत कटौती वित्त मंत्रालय ने कर दी है।नई दिल्ली (वार्ता)। सैन्य बलों के लिए अभी न्यायाधिकरण गठित भी नहीं हुआ है कि इसमें हिंदी और अंग्रेजी की भाषा समेत कई विवाद और अडचनें पैदा हो गई हैं और रक्षा मंत्री एके एंटनी की यह महत्वकांक्षी परियोजना अधर में झूल रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार न्यायाधिकरण में बहस इस मुद्दे पर है कि सैन्य बलों के कर्मियों को यदि खुद पैरवी का अवसर देना है तो इसके लिए हिंदी में सुनवाई होनी चाहिए ताकि जवान अपने मामले में अपना पक्ष खुद पेश कर सकें। लेकिन इसके विरोध में दो तर्क हैं। एक तो यह कि हाईकोर्ट के स्तर के मामले इस न्यायाधिकरण में आएंगे और कानूनी शब्दावली को हिंदी में ढालने और उसी भाषा में जिरह करने में बेहद कठिनाई का सामना करना प़ड़ सकता है।

सूत्रों के अनुसार दूसरा तर्क यह है कि न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ नई दिल्ली में स्थापित होने के अलावा चेन्नाई, कोच्चि, कोलकाता और गुवाहाटी जैसी क्षेत्रीय पीठ में कौन सी भाषा अपनाई जाएगी जहां के जवानों की मातृभाषा हिंदी नहीं है। न्यायाधिकरण की क्षेत्रीय पीठें लखनऊ. चंडीग़ढ़, जयपुर और मुंबई में भी होनी है। सैन्य न्यायाधिकरण का गठन ।५ अगस्त तक हो जाना था लेकिन कई बाधाओं के कारण यह अधर में झूलता जा रहा है। न्यायमूर्ति एके माथुर को न्यायाधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया जा चुका है लेकिन अभी इसके न्यायिक एवं प्रशासनिक सदस्यों तथा गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई है।

सूत्रों के अनुसार गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कानून और रक्षा मंत्रालय में खींचतान है। कानून मंत्रालय का कहना है कि इन सदस्यों की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया से होनी चाहिए जबकि रक्षा मंत्रालय स्वयं ये नियुक्तियां करना चाहता है। समझा जाता है कि रक्षा मंत्री ने इन सदस्यों के लिए जितने पद नौ पीठों के लिए मांगे थे उनमें से ५० प्रतिशत कटौती वित्त मंत्रालय ने कर दी है।

समाचार सौजन्य: हिन्दी दैनिक "नई दुनिया" नयी दिल्ली अंक 13 अक्तूबर 2008

धर्म के नाम पर ऐसा उन्माद क्यों?

Sunday, October 12, 2008

विश्व के श्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थान

2008 के टाईम मैगजीन के सर्वेक्षण के मुताबिक विश्व के 200 श्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थानों में भारत के सिर्फ दो संस्थान शामिल हुए जिनमें भारतीय तकनीकी संस्थान, दिल्ली जो वर्ष 2007 की रैंकिंग के मुकाबले 307वें स्थान से सीधे छलांग लगाकर 154 वें स्थान पर पहुंच गया है और भारतीय तकनीकी संस्थान, मुंबई जो 269 वें स्थान से बढत बनाकर 174 वें स्थान पर पहुंचा है। श्रेष्ठ 20 में एशियाई देशों से सिर्फ जापान का टोकियो विश्वविद्यालय ही दिख रहा है। नीचे क्रमानुसार श्रेष्ठ बीस संस्थानों की सूची है।

1.हार्वड विश्वविद्यालय (अमरीका)
2.येल विश्वविद्यालय अमरीका)
3.कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (ब्रिटेन)
4.ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (ब्रिटेन)
5.सीआईटी (अमरीका)
6.इंपीरियल कॉलेज, लंदन (ब्रिटेन)
7.युनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन (ब्रिटेन)
8.शिकागो विश्वविद्यालय (अमरीका)
9.एमआईटी (अमरीका)
10.कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमरीका)
11.पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय (अमरीका)
12.प्रिंसटन विश्वविद्यालय (अमरीका)
13.ड्यूक विश्वविद्यालय (अमरीका)
14.जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय (अमरीका)
15.कॉर्नेल विश्वविद्यालय (अमरीका)
16.ऑस्ट्रेलियन नेशनल युनिवर्सिटी (ऑस्ट्रेलिया)
17.स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय (अमरीका)
18.मिशिगन विश्वविद्यालय (अमरीका)
19.टोकियो विश्वविद्यालय (जापान)
20.मैक्गिल विश्वविद्यालय (कनाडा)

(साभार - टाईम मैगजीन)

Sunday, October 05, 2008

गर्दा उड़ा देम बिहार में

अब बिहार में इतनी धूल तो ऐसे ही उड़ती है, इससे ज्यादा गर्दा (धूल) उड़ेगा तो क्या होगा!

Thursday, October 02, 2008

जलवायु परिवर्तन का सामाजिक पक्ष

विश्व बैंक की तरफ से गैर पेशेवर लोगों द्वारा जलवायु परिवर्तन के सामाजिक प्रभाव वाले पक्षों पर छोटी छोटी फिल्मों को पुरस्कृत करने का निर्णय लिया गया है। तो आप भी उठाइये अपना कैमरा और बना डालिये अपने आस पास मौज़ूद जलवायु परिवर्तन के अनछुए पहलू पर कोई लघु फिल्म…क्या पता कल आप भी वाशिंगटन में विश्व बैंक के मंच से अपनी बात पूरी दुनिया के सामने रख पायें

Wednesday, October 01, 2008

बधाई धूम्रपान निषेध पर

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कल 2 अक्तूबर यानि बापू के जन्मदिन से भारत में सभी सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लागू हो जाएगा। बापू को याद करने और उन्हें श्रद्धांजलि देने का यह एक नायाब कदम है। निश्चित तौर पर स्वास्थ्य मंत्री श्री अंबुमणि जी इसके लिए बधाई के पात्र हैं। अब सवाल यह है कि रेलवे स्टेशन, स्कूल-कॉलेज, मनोरंजन पार्क, अस्पताल इत्यादि जैसे स्थलों पर धूम्रपान पर यह प्रतिबंध कितना कारगर होता है। कानून तो अपनी जगह सही है लेकिन अपुन के इंडिया में उसके अमल में लाने की समस्या सबसे बड़ी है। जो भी हो कम से कम हम एक कदम आगे तो बढे, अब प्रबुद्ध नागरिकों एवं हमारे समाज के युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर स्वस्थ भारत की ओर कुछ कदम आगे जाने में अपना योगदान दें।

Tuesday, September 30, 2008

संगठित धर्म क्या संगठित अपराध है ?

काफी दिनों से लगातार सोचता रहा हूँ उस माहौल और परिवेश के बारे में जिसमें मैं बड़ा हुआ हूँ। जातीय वैमनस्यता तो बचपन से देखता रहा हूँ अपने चारो ओर परंतु धार्मिक वैमनस्यता अपने आस पास के माहौल में बहुत कम ही पाया था; परंतु जैसे जैसे बड़ा हुआ, अपने आस पास के धार्मिक माहौल में काफी गुपचुप और तेज परिवर्तन महसूस किया मैंने। ईसाइयत से प्रत्यक्ष सदका तो काफी बाद में हुआ परंतु जहाँ तक मैं जिन-जिन ईलाकों में रहा उन सभी स्थानों पर हिंदू,मुसलमान एवं कुछ आदिवासी धर्मों की आबादी में बड़े तौर पर कोई टकराहट का माहौल नहीं पाया। हलाकि हर धार्मिक वर्ग में (स्थानीय आदिवासी धर्मों में बहुत ही कम) कुछ नेतागिरी के तत्व जरूर देखे मैंने परंतु उसका अंतर-सामाजिक संघर्ष में कोई व्यापक असर आम समाज में हो ऐसा मैंने कभी नहीं देखा। ईधर कुछ एकाध दशक के अंतराल में इतना बड़ा परिवर्तन आखिरकार कैसे हो आया कि एक धर्म के लोग दूसरे को इतनी संदेह की नज़रों से देखने लगे। समाज में इतनी धार्मिक हिंसा, दंगे, धर्म परिवर्तन का मुद्दा न जाने इतने प्रबल कैसे हो गये? क्या ये सब धार्मिक आतंकवाद नहीं है? क्या इसके लिए सिर्फ एक धर्म के लोग दोषी हैं? हर धर्म जितना संगठित हो रहा है उतना सदभाव व्याप्त होने की बजाए हिंसा की गर्त में क्यों डूबता जा रहा है?

Saturday, September 27, 2008

नज़रिया बदला बदला

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छोटे-छोटे शब्द, वाक्य, भाव-भंगिमाएँ या कुल मिलाकर कहें तो प्रतीक हमारी संप्रेषण क्षमता में कितना इजाफ़ा या बदलाव पैदा कर देते हैं जिसका असर कभी-कभी बिल्कुल चमत्कार की तरह होता है। ऊपर फिल्माये गये एक लघु-फिल्म जिसे ऊपर दर्शाया गया है इसमें एक अंधा व्यक्ति भिक्षा के लिए एक पात्र लेकर बैठता है और सामने एक तख्त होता है जिस पर लिखा होता है - मुझ अंधे की सहायता करें। लोग आते हैं जाते हैं, कोई उसकी तरफ ध्यान नहीं देता। इस बीच एक नौजवान वहाँ से गुजरता है, वहाँ रुक कर उसकी तख्ती का वाक्य बदल देता है। अब उसके डिब्बे में जैसे पैसे की बारिश होने लगती है। शाम को जब वही युवक वापस आता है तो वृद्ध अंधा व्यक्ति उसके पदचाप को पहचान कर उससे पूछता है कि तुम वही हो न जिसने मेरी तख्ती पर सुबह कुछ लिखा था? आखिर तुमने ऐसा क्या लिख दिया कि लोगों की करुणा जाग उठी? युवक ने क्या लिखा आप ऊपर फिल्म में देख सकते हैं। इस पाँच मिनट की फिल्म को ऑनलाइन लघु-फिल्म प्रतियोगिता में भी नामित किया गया है।

फिल्म आभार- यू ट्यूब, कथा पाठ आभार – साइट हेयर डॉट ऑर्ग (www.citehr.org)

Friday, September 26, 2008

वजूद

बहे नीर आँसुओं की जो
तो पोछ खुद से ही उसे,
इमकान हो किसी को गर
तेरे पीछे पीछे आयेगा,
मौका जो मिले गर उसे
आँसुओं को बेच खाएगा ॥

तू लाल है धरती का ही
तेरे निशाँ मिटेंगे नहीं,
बहता है लहू जो तेरा
एक पौध नयी आयेगी,
इस सितम की दुनिया में
धरती को लाल होने दे ॥


मिट नहीं सकता कभी
तू बार बार जन्मेगा,
खंडहर हो जाएँगी
इमारतें सभी कभी,
दरार से इमारतों की
तेरे शाख हंसीं फूँटेंगे ॥

Wednesday, September 24, 2008

पयामे हर्फ़


ज़र्द सयाही ने कहा है मुझसे

सोख ले आब चाहे तू मेरा

बनूँगा हर्फ मैं मगर लेकिन

रहूँगा बन के तेरी रूहों में

नमी बनकर बरस मैं जाऊँगा

तेरी सूखी हुई इन आँखों से


जलूँगा हर घड़ी तेरे सीने में

क़तरा-क़तरा मेरा शोला होगा

फिर न तू होगा न हर्फ कोई

मिटेंगे फासले तेरे मेरे सारे

नमी तो आसमां में बिखरेगा

मेरी इन बाजुओं की लपटों में

मी लोर्ड वक्त कब आयेगा !!

हिन्दुस्तान की अदालतों में अंग्रेजों के आने से पहले काम-काज मुख्य रूप से हिन्दी (निचली अदालतों में) और फारसी में (विशेष अदालतों) में होता रहा था। कुछ दिनों पहले संसद की एक समिति ने कुछ सिफारिशें करते हुए सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में फैसलों की भाषा को हिन्दी में करने की गुहार की थी जो अब तक धारा ३४८ के तहत अंग्रेज़ी में फैसला देने का प्रावधान है। अब विधि मंत्रालय ने इस पर एक आयोग गठित की जिसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री लक्ष्मणन को बनाया गया और इस बारे में एक रपट पेश करने को कहा गया। इस पर श्री लक्ष्मणन ने सेवा-निवृत न्यायधीशों, विधि विशेषज्ञों, एवं वरिस्थ अधिवक्ताओं से राय मांगी गयी जिसमे बहुत से विशेषज्ञों ने ये कहते हुए अपनी राय जाहिर की है की अभी हिन्दी को उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों में फैसलों की भाषा बनाने का सही वक्त नहीं आया है। जाने कब आयेगा वो वक्त....

वेब-ढाबा

वैसे हिंदुस्तान में इसका प्रचलन बहुत ज्यादा नहीं हुआ है लेकिन अब इसका दौर शुरू होने को लगता है, और बात जब खाने पीने की हो तो लगता है इसकी शुरुआत देर से हो रही है। इन्टरनेट के इस दौर में अगर क्रेडिट कार्ड जेब में हो तो हम लगभग सबकुछ ऑनलाइन खरीद सकते हैं। लेकिन जब खाने पीने का मामला हो तो हमारे पास विकल्प कम ही होते हैं, इसी कमी को दूर किया है बंगलोर के पहली पीढी के उद्यमी अजय मोहन जी ने जिन्होंने बंगलोर वासियों को वेब-ढाबे का तोहफा देकर उनका काम आसान कर दिया है। इस पोर्टल पर न सिर्फ़ बंगलोर के सैकडों रेस्तराओं की सूची मौजूद है बल्कि उनका मेनू उनकी रेटिंग वगैरह वगैरह सब कुछ आप तफसील से देख कर आराम से अपना मनपसंद खाना मंगवा सकते हैं। न कोई डायरेक्टरी उठा कर ढूँढने की झंझट न फ़ोन उठाने की। सब कुछ मौजूद है यहाँ - बटरचिकन हो या मक्के दी रोटी बस एक क्लिक में हाज़िर तो आप अगर बंगलोर में हों तो आजमाइए आप भी वेब-ढाबे को । हाँ अब क्रेडिट कार्ड न मांगिएगा मुझ से :)

Saturday, September 20, 2008

प्यार की झप्पी

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आम तौर पर कम से कम पाँच मिनट पहले कक्षा में पहुँच जाता हूँ ताकि यदि कक्षा में खड़िया या मार्कर वगैरह नदारद हो,या कोई और समस्या हो तो उसका निबटान करवा सकूँ। लेकिन कल कुल तीन मिनट बचे थे और अभी मैं दफ़्तर से कक्षा के बीच आधे रास्ते में ही था। हलाकि तीन मिनट काफी थे कक्षा तक पहुँचने के लिए लेकिन मैंने आगे देखा कोई बीस वर्षीया मेक्सिकी-अमरीकी युवती और कोई चौदह पंद्रह साल का गोरा-चिट्टा, खूब घने बालों वाला एक युवक हाथों में प्लैकार्डस लिए हुए रास्ते में खड़े थे जिसपर लिखा था "फ्री हग्स", हर आने-जाने वाले की ओर प्लैकार्ड हिला-हिलाकर अपनी ओर ध्यान खींचने का प्रयत्न कर रहे थे लेकिन शायद सभी लोग कक्षा या और कहीं पहुँचने की जल्दी में हाथ हिलाते हुए आगे बढ जाते। उन लोगों ने मेरी ओर भी देखा एक मिनट को तो मैं रुका, घड़ी भी देखी लेकिन उनकी आंखों में देखने पर फिर मैं उन्हें गले लगाये बिना नहीं रह सका। लड़की कुछ भावुक होकर बोल पड़ी; मैं शायद पहला आदमी था जो शायद बीस मिनट बाद उनके गले लगा था। बाद में पता चला कि यह एक वैश्विक (शायद पश्चिम के देशों तक सीमित) अभियान है। जो संभवत: पश्चिम की दौड़ती भागती ज़िंदगी, एकाकी और सूनी होती जा रही ज़िंदगी में कुछ लोगों द्वारा संवदेनाएँ जगाए रखने का प्रयास है। अभी इस बारे में मुझे कुछ ज्यादा जानकारी तो नहीं है अगर आप लोगों को कुछ मालूम हो तो इस बारे में विस्तार से कुछ लिखें। थोड़ा सर्च मारकर तुरत-फुरत में एक वीडियो मिला जो उपर आप देख सकते हैं।

प्रभा जी का निधन

हिन्दी साहित्य की प्रमुख लेखिकाओं में प्रभा खेतान जी को मैंने पहली बार विस्कांसिन विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में तब पढा था जब मैं स्त्री विमर्श विषयक कुछ शोध के सिलसिले में ढूँढ रहा था। पहली बार 'छिनमस्ता'पढने लगा तो उस दिन मैं अपनी एक कक्षा में जाना भी भूल गया था। उसके बाद मैंने उनकी और किताबें तलाशी और फिर 'उपनिवेश में स्त्री' 'पीली आंधी' 'अनन्या' और न जाने उनकी कितनी रचनाएँ पढी। जितनी सूक्ष्मता से वे स्त्रियों के मनोविज्ञान और उनकी दशा, दिशा को उकेरती हैं उतनी ही दक्षता के साथ दंभी पुरुष समाज का दोमुंहापन को उघाड़ कर रखती है, उसके अंदर मौज़ूद असुरक्षा ग्रंथियों को इस कदर निचोड़ना हिन्दी साहित्य में सामान्य घटनाओं के माध्यम से इस कदर रखती हैं कि बहुत से पुरुष लेखक जो स्त्री विमर्श के क्षेत्र में बड़े लिक्खाड़ माने जाते हैं वे भी उनके सामने बौने से लगते हैं। महान लेखिका और कर्मयोगी प्रभा जी को विनम्र श्रद्धांजलि।

Friday, September 19, 2008

सामुदायिक रेडियो एवं टेलीविजन


इस बार दो महीने जब मैं जमशेदपुर में रहा तो यूँ तो ज्यादा वक़्त या तो अपने दोस्तों रिश्तेदारों से मिलने-जुलने में गुजरा या अपनी बीमारियों के चक्कर में अस्पतालों और डाक्टरों की सोहबत में। लेकिन इन्हीं सब के बीच जमशेदपुर के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के छोटे छोटे मौके भी मिले। जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह था कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं एवं अन्य लोगों द्वारा सामुदायिक रेडियो का परिचालन। ये स्थानीय लोगों में इस कदर लोकप्रिय हैं कि देखते बनता है, और हो भी क्यों नहीं आखिर इसमें कार्यक्रम बनाने वाले, चलानेवाले से लेकर विषय और सब कुछ स्थानीय होते हैं। कार्यक्रम सुनकर लगता है जैसे अपनी ही बात हो रही है। तकनीकी रूप से कार्यक्रम का स्तर बहुत अच्छा न होते हुए भी पूरा कार्यक्रम समाप्त होने पर भी लगता है - काश इसमें फलां चीज भी डाली गयी होती। कम से कम मुझे इतने सारे एफ़ एम रेडियो, आकाशवाणी के (ज्यादातर) बकवास कार्यक्रमों से तो काफी अच्छा लगा। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह होती है कि लोग अपने आसपास मौज़ूद मुद्दों के बारे में ऐसे रेडियो कार्यक्रमों से काफी जागरूक हो रहे हैं। अपने हक़ों के लिए आवाज़े उठा रहे हैं और ये सब बिल्कुल तथाकथित आम-आदमी द्वारा।

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अब सामुदायिक रेडियो को जिस तरह भारत सरकार बढावा दे रही है उसी तरह सामुदायिक टेलिविजन के क्षेत्र में भी छूट दिये जाने का वक़्त आ गया लगता है। बानगी के तौर पर बिहार के मुज़फ्फरपुर जिले की इन दो बालिकाओं की बात ले लीजिए जिनका "अप्पन समाचार" पूरे क्षेत्र में धूम मचा रहा है। मुम्बई की एक संस्था "अक्षर" द्वारा बनाए गए कार्यक्रम भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। इसी संस्था द्वारा बनाई गयी एक वीडियो, (जिसे आप यहाँ देख सकते हैं) "अपना टीवी" नाम से कार्यक्रम बनाती है।
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Tuesday, June 10, 2008

योजना अबा वेब पर




भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित अत्यन्त उपयोगी और मेरी प्रिय पत्रिका ''योजना" अब अंतर्जाल पर उपलब्ध है। आप भी इस कडी पर चटका लगाएं और इस बहुपयोगी पत्रिका का आस्वादन करें .