कभी कभी लगता है लिखना कितना मुश्किल काम है, पर अब ज्यादा समय तक बैठे रहो और कोई काम न हो तो लगता है कुछ लिखते क्यूँ नहीं. और फिर हो जाता हूँ कुछ भी अटर पटर लिखना. तो लो शुरु कर दिया. अभी पिछले पूरे हफ्ते दोस्त और विद्यार्थी पूछते रहे थे भाई हिन्दुस्तान जा रहे हो – यू मस्ट बी एक्साइटेड. पर कोई खास अनुभूति नहीं होती. दस पंद्रह घंटे बाद की फ्लाइट है, मकान भी खाली करना है कल शाम पाँच बजे से पैकिंग करनी शुरु की, दस बजते बजते थकान से अपनी भी बैंड बज गयी.
मुझे किसी खास मकान से कोई लगाव जल्दी नहीं होता. यहाँ जब आया था तो इस मकान को देखा, मुझे इसका लोकेशन काफी पसंद आया. तपाक से लैंडलार्ड को हाँ कर दी. हाँ करने की देर थी के मकान मालिक बोला चलो फिर लीज साइन कर लो. अब उसकी कार थी टू-सीटर और हम लोग थे तीन --- मैं, मकान मालिक और मेरा नया खोली-मेट. उसने कहा भैये एक जने को डिक्की में बैठना होगा. डिक्की क्या था कार के पीछे एक अटैची भर रखने की जगह थी. उसने ढक्कन को उठा दिया और मैं पीछे अष्टावक्र की मुद्रा में बैठ रहा. डिक्की में पहली बार बैठकर सफर करने का रोमांच और वो भी अमरीका में. लग रहा था चलो कुछ तो अदभुत काम इस देश में आकर किया.
मकान मालिक जितनी मीठी मीठी बातें कर रहा था उससे तो लगता था के सारे दुनिया की चीनी मिलों की चीनी इसी में खप गयी होगी. अभी मुश्किल से कार ने हवा में बाते करनी शुरु ही की थी कि पीछे से पुलिस की कार सायरन बजाती हुई हमारे आगे आकर हाजिर. हमने कहा लो भैया गये काम से. और मकान मालिक था के दाँत निकाल कर खिखिया रहा था. हमने कहा पगला गये हो का भैया (आर यू क्रेजी). वो बोल उठा – फिकर नाट यार – आई विल फिक्स दिस बिच, अब दोनो स्पैनिश में गिटर-पिटर कर रहे थे, पहिले तो ऊ हंटरवाली गुस्से में दिखत रही – पर जैसे जैसे दो चार मिनट बीता उसके चेहरे पर मुस्कुराहट खिलने लगी. पूरे वार्तालाप में मुझे और मेरे भावी खोली-मेट को सिर्फ इतना समझ आया कि 9 बजे रात में उन दोनों के बीच कुछ तय हुआ है. खैर हमे का, हम तो इतने से संतुष्ट थे कि हमरे पल्ले कोई फाईन-वाईन का चक्कर नहीं हुआ. हम तो सिर्फ इतना सोच रहे थे कि देखो भाई कितना इमानदार देश है, यहाँ हमारे ठोला-पुलिस की तरह नहीं होता कि मुँह उठा के बोले निकालिये चाय-पानी....मेरा भी और बडा बाबू का भी.
लीज साइन कर लिया, इतना अच्छा सेल्समैनशिप वाला गुण था उसमें कि जहाँ हमें नौ महीने का लीज साइन करना था हमने बारह महीने का साइन कर लिया. अब शुरु हुआ हमारे रोने के दिन का. धीरे धीरे मकान की खूबियाँ एक-एक कर सामने आने लगी.
शेष भाग छोटे से (दो-तीन घंटे के) कमर्शियल ब्रेक के बाद. अटकिये मत, भटकिये मत देखते रहिये हमार टीभी.........
Wednesday, May 11, 2005
किस्सा-ए-मकाँ
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2 comments:
विजय भाई,
मजा आ गया, बहुत चकाचक है
अगले अंक का इन्तजार रहेगा.
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