Saturday, February 19, 2005

अक़्स




डालकर बाँहों में बाँहें

सिमट आयी दूरियाँ हैं

शाम की तनहाईयों में

झील की गहराइयों से

हवा का झोंका उड़ा है

ढेर सारी नमी लेकर…

बादल उठे हैं इस नमी से

हहरा रहा दरिया-ए-दिल

सींचने दो मन का आँगन

करूँ अर्पण प्राण और मन


मिटने चली हो नदी जैसे


आगोश मे सागर की आकर

सृष्टि की हम पर निगाहें

ठहरो जरा अमरत्व पा लें

भष्म होकर जी उठें हम

सिक्त अंतर-घट हो अपना

हर युगों में फिर से विचरें

इक-दूसरे का अक्स बनकर……

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