Friday, September 19, 2008

सामुदायिक रेडियो एवं टेलीविजन


इस बार दो महीने जब मैं जमशेदपुर में रहा तो यूँ तो ज्यादा वक़्त या तो अपने दोस्तों रिश्तेदारों से मिलने-जुलने में गुजरा या अपनी बीमारियों के चक्कर में अस्पतालों और डाक्टरों की सोहबत में। लेकिन इन्हीं सब के बीच जमशेदपुर के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के छोटे छोटे मौके भी मिले। जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह था कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं एवं अन्य लोगों द्वारा सामुदायिक रेडियो का परिचालन। ये स्थानीय लोगों में इस कदर लोकप्रिय हैं कि देखते बनता है, और हो भी क्यों नहीं आखिर इसमें कार्यक्रम बनाने वाले, चलानेवाले से लेकर विषय और सब कुछ स्थानीय होते हैं। कार्यक्रम सुनकर लगता है जैसे अपनी ही बात हो रही है। तकनीकी रूप से कार्यक्रम का स्तर बहुत अच्छा न होते हुए भी पूरा कार्यक्रम समाप्त होने पर भी लगता है - काश इसमें फलां चीज भी डाली गयी होती। कम से कम मुझे इतने सारे एफ़ एम रेडियो, आकाशवाणी के (ज्यादातर) बकवास कार्यक्रमों से तो काफी अच्छा लगा। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह होती है कि लोग अपने आसपास मौज़ूद मुद्दों के बारे में ऐसे रेडियो कार्यक्रमों से काफी जागरूक हो रहे हैं। अपने हक़ों के लिए आवाज़े उठा रहे हैं और ये सब बिल्कुल तथाकथित आम-आदमी द्वारा।

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अब सामुदायिक रेडियो को जिस तरह भारत सरकार बढावा दे रही है उसी तरह सामुदायिक टेलिविजन के क्षेत्र में भी छूट दिये जाने का वक़्त आ गया लगता है। बानगी के तौर पर बिहार के मुज़फ्फरपुर जिले की इन दो बालिकाओं की बात ले लीजिए जिनका "अप्पन समाचार" पूरे क्षेत्र में धूम मचा रहा है। मुम्बई की एक संस्था "अक्षर" द्वारा बनाए गए कार्यक्रम भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। इसी संस्था द्वारा बनाई गयी एक वीडियो, (जिसे आप यहाँ देख सकते हैं) "अपना टीवी" नाम से कार्यक्रम बनाती है।
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3 comments:

  1. अच्छा लगा बहुत दिनों बाद आपको पढ़कर. वापस आ गये आप. कैसी तबीयत है?

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  2. अरे कहां गायब हो जाते हो भैया! दिखते नहीं। जरा सक्रिय रहा करो। लिखते रहो। बहुत दिन बाद पढ़ा अच्छा लगा!

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