सन साठ के दशक में हिन्दी काव्य जगत में "अकविता" के नाम से एक नया आंदोलन शुरु हुआ। जगदीश चतुर्वेदी, मुद्रा राक्षस, रवीन्द्रनाथ त्यागी, श्याम परमार, सौमित्र मोहन जैसे कवि इस आंदोलन के चैंपियन माने जाते थे। वैसे आंदोलन कहना मेरे खयाल से अतिशयोक्ति ही होगी। आज पुस्तकालय की खाक़ छानते छानते इस चौकड़ी की बहुत सी कविताओं से सामना हुआ। बाद में इनके बारे में और जानने की उत्सुकता हुई तो कुछ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली पुस्तक भी छानी, हाँ तो अब जाकर पता चला कि आखिर अकविता के पीछे पश्चिम के कवि महोदय गिन्सबर्ग की प्रेरणा रही थी, तभी तो…
खैर, अकविता के कुछ उद्धरण भी देता चलूँ:-
1
प्रतिज्ञा की अन्तिम कड़ी में
उसकी गुप्त योनि मेरे सन्निकट निर्वसन पड़ी है
और मैं कराह रहा हूँ।
2
रोते हैं कुत्ते खंडित दीवारों के पास
निद्रा में चौंक जाती है बेखौफ़ लड़कियाँ
घायल गौरय्यों सी फड़फड़ाती है उनकी देह
और बिस्तर में रेंगते हैं, गिल बिले सर्पों के
मानव लिंगीय आकार
3
स्तनों को प्यार करते हुए, मुझे कभी सुख नहीं मिला
बनमानुष की तरह मैंने उन्हें दाँतों से काटकर
अँधेरी सड़कों पर थूक दिया है।
(तीनों अंश : जगदीश चतुर्वेदी की कलम से)
4
बिना किसी विशेषण के उसकी उसकी पिंडलियों में गुदगुदी करते
हुए मैंने उस औरत को रात के अंधेरे में पहचाना
मैल और रज में सने उसके अग्रभाग को सूँघकर
कुत्ते की तरह हवा में ठहरे रहा।
(सौमित्र मोहन)
5
सुबह होने से लेकर दिन डूबने तक
मैं इंतज़ार करती हूँ रात का
जब हम दोनों एक दूसरे को चाटेंगे।
विवाह के बाद ज़िंदा रहने के लिये
जानवर बनना बहुत जरूरी है।
6
क्या ऐसा संभव नहीं
कि मैं इतनी
हृदयहीन हो जाऊँ कि एक साथ
बहुत से लड़कों से प्यार कर सकूँ।
(5 और 6: मोना गुलाटी)
चलते चलते यौन संबंधो से हटकर एक अंतिम नमूना अकविता का: (वैसे अतिरंजित रूप में आप चाहे तो फ्रायड महोदय की सेवा ले सकते हैं):-
7
चूहा, बिल्ली, कुत्ता
हाथी, शेर, रीछ, गेंडा, बारहसिंगा
लकड़बग्घा
भैंसा, गाय, सूअर
तीतर, बटेर, कबूतर
साँप, बिच्छू, अजगर
बकरा, ऊँट, गधा, घोड़ा
और मैं
(कवि श्री श्री 1008: सतीश जमाली)
Tuesday, April 05, 2005
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3 comments:
"5 -
सुबह होने से लेकर दिन डूबने तक
मैं इंतज़ार करती हूँ रात का
जब हम दोनों एक दूसरे को चाटेंगे।
विवाह के बाद ज़िंदा रहने के लिये
जानवर बनना बहुत जरूरी है।"
यह वाली सेक़्स कविता नही है - मेरे विचार मे, वो अकविता सुना कर भेजा चाटने चटवाने की बात कर रही हैं.
और शुक्र करो श्री श्री १॰॰८ जमाली जी ने १॰॰८ जानवरों के नाम नहीं लिए।
सेक्स कविता के चक्कर में कहां फंस गये ठाकुर साहब?जितना मैं जानता हूं वह यह कि यह प्रवृति देखा-देखी नकल मारने की थी.दूसरे विश्वयुद्ध में पश्चिमी देशों में बहुत बरवादी हुयी.मूल्यों में विघटन
आये तथा मारा-मारी रही .उसी कारण यह लुटी-पिटी कविता सामने आयी.सिवाय सनसनी फैलाने के यह कविता कुछ नहीं देती.एक बहादुरी (बोल्डनेस )का अहसास कि देख हम कुत्सिततम विचार कितनी सहजता से रख रहे हैं .इसको लपका भारत के कवियों ने भी मैकूलाल चले मायकल बनने वाले अंदाज में.जबकि उस समय देश में
आशाओं के ज्वार लहलहा रहे थे.इस देश का यारों क्या कहना,यह देश है दुनिया का गहना,इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के जैसे गीत हवा में लहलहा रहे थे.कुछ लोग देखादेखी कारवां लुटा के गुबार देख रहे थे.देश की न सामाजिक स्थिति ऐसी थी न ऐसी निराशा थी कि ये कवितायें देशकाल के अनुरूप हों.पर कवि का क्या?जहां न जाये रवि-वहां जाये कवि.लपका लिख मारा.गिन्सबर्ग अमेरिकन खाये-पिये-अघाये तथा सुख से ऊबे वर्ग की भावना बता रहे थे हमारे वीरबालक लपक रहे थे.बहरहाल शुक्रिया कुछ सनसनीखेज कवितायें मुहैया कराने के लिये.
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