Tuesday, April 12, 2005

आक्टोवियो की टिप्पणियाँ

आक्टेवियो पाज़ हिस्पैनिक दुनिया में पहले तो प्रमुखतम राजनयिकों, बुद्धिजिवियों और बाद में नौकरी को लात मारने के बाद विश्व के प्रमुख कवियों मे शुमार हुए। कुछ समय तक भारत में मेक्सिकों के राजदूत के रूप में काम किया। राजनयिक के रूप में उस दौर के कलाकरों, और साहित्यकारों से उनके काफी व्यक्तिगत संबंध रहे। उन्होंने भारत के प्रमुख विरासतों का काफी सूक्ष्म अध्यन किया और उसे नज़दीक से जानने के लिए काफी यात्राएँ की। उनके बाद की रचनाओं में भारतीय दर्शन की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। एक बाहरी व्यक्ति जिन चीजों को देख पाता है कभी-कभी हम उस संस्कृति में जीवित रहते हुए भी उस तंतु को या तो पकड़ नहीं पाते या वे हमारी अस्मिता में इस क़दर घुल मिल गयी होती है कि उसके साथ जीवित रहते हुए भी उस पर सोचने का हम अवकाश नहीं पाते। अपने विभिन्न साक्षात्कारों और भारत संबंधी वक्तव्यों, तथा निबंधों के माध्यम से भारत के तात्कालिक कला-साहित्य परिदृश्य के संबंध में अपनी तल्ख़ टिप्पणियों के कारण एक ओर जहाँ उनकी आलोचनाएँ भी हुईं दूसरी ओर काफ़ी साहित्यकारों ने उनके टिप्पणियों की सत्यता पर विमर्श भी करना शुरु किया।

पाज ने हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार श्रीकांत वर्मा को एक साक्षात्कार देते हुए कहा था कि आज भारत के साहित्यकार दिग्भ्रमित हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि वे पश्चिम (ख़ासकर अमरीका और ब्रिटेन) को ही एक हद तक संसार मानकर चल रहे हैं, जबकि "मुझे आश्चर्य है कि भारतीय समाज, जिसकी परम्पराएँ क्लासिक परम्पराएँ हैं ब्रिटेन और अमरीका के साहित्य के साथ अपना रिश्ता कैसे क़ायम कर सकता है, जिसकी परम्पराएँ "एण्टी-क्लासिक" है, मेरा निश्चित मत है कि भारत को ऐसी परम्परा को अपना आदर्श नहीं मानना चाहिए जिसने अपने सबसे बड़े जीनियस (शेक्सपीयर) के रूप में भी 'इक्सेन्ट्रिक' ही पैदा किया। और अमरीका की तो अपनी कोई परम्परा है ही नहीं; यहाँ विचारों सहित सब कुछ आयातित है।

पाज को भारत के ज्यादातर बौद्धिक छद्म-बौद्धिक ही लगे, कई कारण उन्होंने गिनाए। लेकिन सबसे बड़ा कारण उन्हें 'प्रतिभा' का आभाव दिखा, जो उनके अनुसार कृत्रिम रूप से पैदा कर दिया गया है। उन्हें सबसे हैरानी थी कि छोटे-छोटे देशों के समाचार पत्रों की भी जहाँ देश विदेश के साहित्य और कला में गहरी दिलचस्पी होती है वहीं हिन्दुस्तान में आकर उन्होंने यही देखा कि "अख़बार ओछी-से-ओछी राजनैतिक बातों में तो रुचि रखते हैं लेकिन साहित्य से उनका कोई सरोकार नहीं, यहाँ तक कि साप्ताहिक संस्करण भी साहित्य और कला के नाम पर मज़ाक पेश करते हैं।" शायद अखबारों को इसका अंदाज़ा ही नहीं कि एक लोकप्रिय समाचार पत्र लोकरुचि को साहित्यिक और संवेदनशील बनाने में कितनी बड़े सहायक की भूमिका निभा सकता है। अँग्रेजी भारतीय साहित्य की सबसे बड़ी दुश्मन है और भारत है के राजनेता से लेकर बुद्दिजिवी वर्ग इसी की दुम पकड़े हुए है।

विश्व सभ्यताओं में भारत का एक अनोखा स्थान रहा है। उसने अपने दर्शन से संसार का पथ-प्रदर्शन किया है। लेकिन, भारत राजनीतिक अर्थों में, कभी महान सत्ता नहीं रहा। वह हमेशा विचारों के स्तर पर जीवित रहा। दूसरे, 'गुप्त युग' को छोड़ वह हमेशा विश्व-संस्कृति के प्रवाह में रहा। मौर्यों ने पश्चिमी प्रभाव को उसी तरह स्वीकार किया जिस तरह कि आज के कांग्रेसी शासकों ने। बल्कि बहुत सी बातों में मौर्य उस जमाने के कांग्रेसी थे। मध्ययुग में भारत ने मुग़ल संस्कृति को आत्मसात किया। राजनीतिक अर्थों में यह भारत की विफलता है। लेकिन गहरे अर्थों में यही भारत के बने रहने का कारण है कि उसने अपने अस्तित्व के लिए राजनीति के स्तर पर नहीं बल्कि दर्शन के स्तर पर संघर्ष किया।

तो क्या, मनुष्य सिर्फ़ दर्शन के स्तर पर बचा रह सकता है? पाज का कहना है -- "काफी हद तक"। महान राज्य बनने का कोई अर्थ नहीं रह गया है। एक तो अब भारत चाहकर भी "महान" राज्य नहीं बन सकता। इसके लिए अब बहुत देर हो चुकी है। लेकिन अगर वह एक महान राज्य बन भी जाता तो क्या हो जाता? यहाँ पाज भारत की तुलना चीन से करते हुए कहते हैं - "माओत्से तुंग वैसे घटिया कवि हैं, लेकिन अगर वह महान कवि होते, तब भी मैं यह कहने में संकोच नहीं करता कि उन्होंने चीन को बर्बाद कर दिया। उसे केवल राजनैतिक स्तर पर जीवित रखकर्। शायद इसमें कुछ चीनी परम्परा का भी दोष है। चीन की दार्शनिक सुक्तियों में भी राजनीति है और चीनी जब भी पीछे की ओर मुड़ते हैं तो इन सूक्तिओं से केवल राजनैतिक अर्थ प्राप्त करने के लिए -- लेकिन इसकी तात्कालिक जिम्मेदारी 'सांस्कृतिक क्रांति' के प्रवर्तक माओत्से-तुंग पर है। भारत की परम्परा चीन से अलग है । अगर भारत पीछे की ओर मुड़ता है तो राजनीति या कौशल के लिए नहीं बल्कि मनुष्यता के लिए दार्शनिक प्रेरणा पाने को।"

आगे सिलसिला जोड़ते हुए श्री पाज कहते हैं कि "मैं सन्यास नहीं सिखा रहा हूँ और न ये कह रहा हूँ कि भारत को राजनीति से सन्यास ले लेना चाहिए। मेरे कहने का मतलब केवल इतना है कि आज हमें एक ऐसी विश्व सभ्यता की जरूरत है जो वैज्ञानिक आकांक्षा और कविता के आन्तरिक अनुशासन का समन्वय दे सके। और मुझे यह संभावना सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत में ही दिखती है। हो सकता है इसमें सौ साल लग जाएँ लेकिन भविष्य के लिए दृष्टि शायद भारत से ही मिल सकती है।"

जीवन प्रवाह को अतीत और भविष्य में बाँटकर नहीं देखा जा सकता। जो धर्म जितना अधिक दर्शन होगा वह उतना ही कालजयी होगा और जो दर्शन जितना ही अधिक धर्म होगा वह उतना ही क्षणभंगुर होगा। यहाँ की लोक-परम्पराएँ इतनी महान है जो भारतीय जीवन का अविभाज्य अंग है। लेकिन पीड़ा की बात है कि भारतीय "एलीट" इस लोक संस्कृति को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

वे कहते हैं "मुझे सबसे अधिक यहाँ के अंग्रेजी पढे वर्ग से है, जो एक ओर तो साहित्य और संस्कृति का नाटक करता है, और दूसरी ओर अपने ही देश की सांस्कृतिक आकांक्षाओं को नष्ट करता है। इस वर्ग ने भारतीय जीवंत कला को म्यूज़ियम की चीज बनाकर इसकी मौत का इंतज़ाम कर दिया है। इसकी रुचि घटिया और भद्दी है। और यही यहाँ का शासक बन बैठा है। यह पाखण्डी और नक़्क़ाल वर्ग है। इसने अँग्रेजी साहित्य का भी अधूरा अध्यन किया है। शेक्सपीयर उसके ड्राइंगरूम के सजावट की चीज है। जब तक यह वर्ग बना रहेगा भारतीय साहित्य का विकास ऐसे ही लुंज-पुंज रहेगा बल्कि मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि उसके रहते भारत राजनीतिक अर्थों में भी कभी स्वाधीन नहीं हो सकता। लोग यह बात भूल जाते हैं कि संस्कृति के माध्यम से भी शासन किया जाता है, संस्कृति की भाषा में भी राजनीति की इच्छाएँ व्यकत होती है। ब्रिटेन और अमेरिका भारत के अंग्रेजीपरस्त शासक वर्ग के माध्यम से भारत में पहले की तरह टिके हुए हैं। भारतीयों को यह पहचानना जरूरी है कि खुद की भाषाओं और साहित्य के विकास के बग़ैर अभी भी दूसरे अर्थों में गुलामी में ही जी रहे हैं।"


(यह साक्षात्कार सत्तर के दशक में श्रीकांत वर्मा जब आयोवा विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफ़ेसर थे उस वक़्त लिया गया था। तब से अबतक काफी परिवर्तन हो चुके हैं, यहाँ तक कि चीन और भारत भी अब क़रीबी रिश्तों के लिए बेताबी दिखा रहे हैं। -- पूरा इंटरव्यू और अन्य लेखकों के साथ उनके साक्षात्कार "बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में" लेखक: श्रीकांत वर्मा, में संकलित है)

2 comments:

  1. RAJESH KUMAR SINGHWednesday, April 13, 2005

    विजय जी,
    आक्‍टोवियो के विचारों को अपने ब्‍लाग पर,पढा कर, आप ने ,यह सोचने पर मजबूर कर दिया,कि,
    हम अपनी जिन समस्‍याओं के समाधानों के प्रयास में असफल रहे ,उसकी एक सबसे प्रमुख वजह यह थी ,या ,है ,कि समस्‍याओं का जितना
    निर्मम विशलेषण किया जाना चाहिए था,वह हुआ नहीं।
    बाहर का आदमी,कभी-कभी उन कारणों व उनके कारकों,को जितनी स्‍पष्‍टता से देखता है,और उसे अभिव्‍यक्त कर पाता है,वह शायद इसीलिए सम्‍भव हो पाता है,कि,उसे,मौजूद चीजों के प्रति,निष्‍ठुरता बरतने में,किसी वर्ग या विचारों के पक्षधर बने रहने का व्रत आड़े नहीं आता।

    -राजेश कुमार सिंह

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  2. विजय जी
    आपका यह लेख वास्तव में सराहनीय है। साहित्यकार श्री कांत वर्मा जी के साथ १९९०
    नोबेल पुरस्कृत श्री ओक्टेवियो पाज़ के साक्षातकार का सारांश बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है।
    कितना सत्य कहा है उन्हों नेः" इस वर्ग (अंग्रेज़ी पढ़े वर्ग) ने भारतीय जीवंत कला को
    म्यूज़ियम की चीज़ बना कर इसकी मौत का इंतज़ाम कर दिया है।" इसके अतिरिक्त आपके स्वयं के विचार भी पाठक के मस्तिष्क पर एक ऐसा प्रभाव छोड़ जाते हैं कि कुछ सोचने के लिये,
    कुछ खोजने के लिये बाध्य हो जाता है।
    इसके लिये धन्यवाद तथा बधाई!
    महावीर

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