Wednesday, December 29, 2004
मंगल हो नववर्ष तेरा
नये मोतियों से खुशियों के, दीप्त सीप नैनों के तेरे.
हर भोर तेरी हो सिन्दूरी, हर साँझ ढले तेरे चित में
झंकार करे वीणा जैसी, हर पल के तेरे आँगन में.
जगमग रोशन तेरी रातें झिलमिल तारों की बारातों से
सूरज तेरा दमके बागों में और जाग उठे सारी कलियाँ.
रस-प्रेम लबालब से छलके तेरे सागर का पैमाना
तेरी लहरें छू लें मुझको सिक्त जरा हो मन अपना.
महकाये तुझको पुरवाई, पसरे खुशबू हर कोने में
वेणी के फूलों से अपने इक फूल बचाकर तुम रखना.
कोई फफोला उठे जो मन में, बदली काली आये कोई
टीस और बूँदें पलकों की, निर्द्वंद नाम मेरे कर देना.
सजा रहा हूँ इक गुलदस्ता नये साल की सुबह-सुबह मैं
तकती क्या हो, आओ कुछ गुल तुम भी भर लो न !!
Tuesday, December 28, 2004
सुनामी लहरें
रौद्र होकर धरती से मिलने
लौट चली है अब घर अपने
आगोश में समेटे कस कर
कई यादें, कई सपने,कई रिश्ते
बिलखता छोड़ अपने पीछे
मातम की ये इंसानी बस्तियाँ
अरी ओ अल्हड़ सुनामी लहरें
हम तो यूँ भी आते थे पासतेरे,
शायद तुझे सबर ही नहीं
पर हारेंगे नहीं जान ले तू
तेरे इसी मलबे से निकलेंगे
और भी सपने, और भी रिश्ते नये.
Sunday, December 26, 2004
देख हो लालू

यानि उद्देश्य साफ है भइया; ठलुअई तो करते ही हैं अब ललुअई हो तो कैसा रहे? मतबल मेरा कि थोड़ा इंटरटेनमेन्ट हो जाए तो कएसा रहे? लालू से अच्छा टाइमपास का बहाना का हो सकता है भला. हम तो समझ गये, ब्लाग पढनेवाले भी समझ ही गये गये होंगे, क्यों लल्ला, लल्लू ही रहोगे पूरे के पूरे. कई माई के लाल पता नहीं कैसे कब लालू से ललुआ आ फिर लल्लू बन गये और बना दिये गये. देखो लल्लू भाई अर्रर्र माफ़ करना भइये लालू साहब, इ सब पचरा तुम भी बूझता ही होगा पर एक ठो बतिया साफ-साफ बताय दें पहिले तुम बिहार में भंइसी का सींग पकड़ के चढ़ जाता था आ चाहे जो भी आहे-माहे करता था ऊ त ठीक था, पर अब तुम हो गिया है रेल मंतरी अओर ओ भी माननीय रेलमंत्री, अब इहाँ न भंइस है न बिहार बला कादो. ई दिल्ली है भाई, कुछ बदलो सरऊ अपने आप को. इहाँ सच्ची में हेमामालिन का गाल जइसा रोड है. आ लोग इहाँ हावा भी अंग्रेजीये में छोड़ता है, अओर एक ठो तुम है; सतुआ खा-खा के भजपूरी महकाता रहता है. पूरा संसद घिनाये रहता है, दिल्ली आ दुनिया का पीपुल से बात करना है भजपूरी नहीं चलेगा. थोड़ा दिन का बात होता त सब तुमको थोड़ा 'एक्जाटिक' 'नेटीभ' आ 'रूरल' समझ के इंटरटेन हो जाता इहाँ, लेकिन तुमको रहना है पाँच साल रे भाई, बतिया समझता काहे नही है. कुच्छे महीना में सब बोर हो जाएगा अओर इ सब वर्डवा बदल के 'देहाती भुच्च' बन जायेगा. अओर मीसा के बाबू, ई कुल्हड़-फुल्हड़ का चक्कर में तुम मत पड़ो ई सब करना था त गरामीन विकास मंतरालय काहे नहीं लिया रे सार, इस्टीले का कुल्हड़ चलवा देता गाँव-गाँव में, आ इस्टीले का नादी भी बनवा देता गाँव का सब भंइसियन के लिये, भंइसी सब केतना आसीरबाद देता तुमको, है कि नहीं. आ बहुत खुशी लगता तुमको त सब भईंसियन खातिर डबरा सब को स्वीमिंग पूल बनवा देता. एतना समझा रहा हूँ, माथा में कुछ ढुक रहा है कि नहीं. फईजत करा के रख देगा तुम त. अभी रमबिलसबा से कपड़-फोड़ौअल करबे किया था, अभी का जरुरत था रुपैया बाँटने का, एकदम से हड़बड़ा जाता है, अब देखो सब रमलील्ला मंडली घुसल है इलेकसन कमीसन में तभिये से. अभी बहुत टाइम है, अभीये से नरभसाओ मत, समझा कि नहीं, रबड़ी का टेक केयर हो रहा है बीना रीजन के बेओजह परेसान रहता है. अरे तुम सोनिया का खियाल रखता है त मैडमो खियाल रखबे करेगी, है कि नहीं. बुड़बक कहीं का, देखो परधानमंतरी बनना है तुमको त सब लंदफंदिया काम छोड़ना पड़ेगा अभी तुमको. दिल्ली में रहना है त दिल्लिये बला बन के रहना सीखो.
Saturday, December 25, 2004
इस्लामी दुनिया की हलचल
Wednesday, December 22, 2004
शुक्रिया प्रत्यक्षा जी
बात कहनी तो है तुमसे
पकड़े हुये लेखनी अपनी
उलटे हुए पोथी शब्दों की
बैठा हूँ खोले ई-मेल, मगर
उड़ते हैं दूर बागों में कहीं
भँवरा बनकर, इक फूल से
दूसरे फूल पर, और कभी
हाथ आई मछलियों सी
फिसल जाते हैं गिरफ़्त से
शब्द मेरे, करता हूँ प्रयास
वाक्यों को लिखता-मिटाता
सिरजता हूँ संसार अपना
कम्प्यूटर के इस पर्दे पर
मेरी तूलिका रंगो में डूबी,
प्रतीक्षारत जाने किस रंग के
करता हूँ सेव अपना ड्राफ्ट
कल फिर से करेगा कोशिश
कलाकार अपना, बसायेगा
इक नयी दुनिया सुनहरी
परिंदो का सा जहाँ अपना
छोड़ो भी शब्दों के बाने को
उड़ सकोगी क्या साथ मेरे
घोंसला छोड़कर सारा जहाँ
ढूँढने को फिर से आबो-दाना??
Sunday, December 19, 2004
बधाई भूटान और भूटानी जनता को
भूटान दुनिया का पहला देश है जहाँ तंबाकू उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है.
भूटान के मंत्री जिग्मे थिनले ने कहा, "हम प्रदूषण की समाप्ति और अपने नागरिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य चाहते हैं". ऐसा शायद इसलिये संभव हो सका है कि वहाँ अभी भी ग्लोबलाइजेशन का दैत्य अपने नाखून नहीं गड़ा सका है। अपने हिन्दुस्तान में भी यदा कदा सिगरेट पर प्रतिबंध, गुटखे पर प्रतिबंध की बात होती रहती है। और जब भी किसी किसी राज्य में ऐसा होता है तो गाज छोटे मोटे पान की दुकान चलानेवालों पर गिरती है। उसके बाद आता है नंबर खरीदने वालों का जो एक की जगह तीन देकर भले खरीदें लेकिन माल तो हासिल कर ही लेते हैं। तीसरा नंबर आता है हमारे ठोला-पुलिस विभाग का जो दुकानदारों को हड़का-हड़का कर न तो उन्हें बेचना बंद करने देते हैं और न बिना पैसे लिये बेचने दिया करते हैं यानि सब धन साढे बाइस पसेरी। कार्यवाही अगर किसी पर नहीं होती तो वे हैं सिगरेट बीड़ी बनानेवाली कंपनियों पर। अभी तक ये तो हो नहीं सका कि कम से कम पूरे देश में ये कानून बने कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने के वालों के खिलाफ सख्त जुर्माने की व्यवस्था की जाये। अरे कइसे होगा भाई नेताजी फूँकते हैं धकाधक आ खईनी थूकते हैं कुर्सी पर से पुच्च पुच्च मंत्रालये में न!!
Sunday, December 12, 2004
चाय
चाय हो कुछ, और छेड़ूँ
बात तेरी कुरकुरी सी,
साथ अपने मखमली हो
यादों का लिहाफ तेरा
ओढकर बैठूँ जो यारा
उष्णता का बने घेरा
धुंध अपनी दूर हो फिर
शीशे के पार जो जमाये है
अपना डेरा जाने कब से ॥
राधिका
देह लंबी और सुरेबदार
चेहरा भरा पुरा
अधर लाल लाल
बाब्ड हेयर बेस
कटे छटे कुंतल जाल
भँवें खूब सँवरी सँवरी
मर्मभेदी कपोल
कजरारे आँखों की कोर
अनावृत मुक्तोदरी
आवर्त दारूण नाभि
रँगे हुये बीसों नाखूनों के पीठ,
हरित वसना
आज की राधिका
वीर देवी स्कूटरवाहिनी
घूम आइये सँध्याकाल
किसी होटल में रस्ता तकते
बाँके बिहारी लाल
**************
(मूल कविता: मैथिली)
गोर गहुमा कांति
देह नमछर आ सुरेबगर
मूह कठगर
ठोर लालेलाल
बाब्ड हेयर
केश कपचल कृष्ण कुंतल जाल
भौंह बेस पिजौल मर्मवेधी टाकासुन
कजरैल आँखिक कोर
अनावृत मुक्तोदरी
आवर्त दारुण नाभि
रंगल बीसो नौहक उज्जर पीठ
हरित वसना
आइ काल्हुक राधिका
देवी स्कूटरवाहिनी
घुरि आउ सँध्याकाल
कोनो होटल मध्य
बाट तकैत छथि
बाँके बिहारीलाल
*****************
कविता: वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' मैथिली अकादमी, इलाहाबाद
पत्रहीन नग्न गाछ 1968
Tuesday, December 07, 2004
पसीने का गुणधर्म
*****
क्षार-अम्ल
विगलनकारी, दाहक…
रेचक, उर्वर
रेक्शेवाले के पीठ की ओर का
तार-तार फटा बनियान
पसीने के अधिकांश गुणधर्म को
कर रहा है प्रमाणित
मन होता है मेरा
विज्ञान के किसी छात्र से पूछूँ जाकर
कितना विगलनकारी होता है
गुणधर्म पसीने का
रिक्शेवाले के पीठ की चमड़ी
और होगी कितनी शुष्क-श्याम
स्नायुतंत्र की उर्जा और कितनी उबलेगी
इस नरवाहन की शक्ति
और कितनी सीझेगी…
और कितना……
क्षार, अम्ल, दाहक, विगलनकारी…
(मूल कविता: पसेना-क गुणधर्म, मैथिली में, कवि वैद्यनाथ मिश्र "यात्री"*)
पत्रहीन नग्न गाछ 1968 से अनूदित
*वैद्यनाथ मिश्र यात्री हिन्दी साहित्य में बाबा नागार्जुन के नाम से मशहूर हैं।
Monday, December 06, 2004
महाराजा की संस्तुति
- रात के खाने के लिये अनेक चुनाव हैं।
- इसलिये इस खाने की मैं संस्तुति करती हूँ।
- भेंड़ साग नशीला है।
- खाने के बाद लस्सी या मदिरा पीजिये।
- खाने के बाद मिठाइयाँ सुलभ हैं।
- मैंने खाना को दो तारे दिये।
- प्राच्य महाराजा जाइये – कमाल के लोग – कमाल का खाना।
डिसक्लेमर: चेलिन की आलोचना यहाँ उद्देश्य नहीं है।
Thursday, December 02, 2004
हिन्दी का विश्वकोष
अररर्र लगता है मैं कोई निबंध लिखने बैठ गया। चलिये भूमिका तो बहुत बड़ी हो गयी है। जो लोग नहीं जानते उनको बताना चाहता था कि हिन्दी सहित विश्व की अन्य कई भाषाओं में वेब पर एक बृहत विश्वकोष 'विकिपीडिया" के नाम से बनाया जा रहा है। यह एक खुला विश्वकोष है जिसमें कोई भी अपना योगदान दे सकता है। भारतीय भाषाओं की कहें तो जहाँ तक मेरी जानकारी है अब तक हिन्दी, बांग्ला, गुजराती, मराठी, तमिल सहित कुछ अन्य भाषाओं में इसकी शुरुआत हो चुकी है। हाँ तो मेरा सभी ब्लागी (ब्लागी शब्द लिखते ही मुझे न जाने क्यूँ भारत के दागी मंत्रियों के नाम याद आने लगते हैं) मेरा मतलब चिट्ठा लिखने वाले भाइयों से निवेदन है कि हम अपनी अपनी ठलुअई से जब भी थोड़ा वक़्त मिले तो अपनी अपनी भाषा में इस पर अपने स्तर पर छोटा ही सही अपना योगदान अवश्य करें।
हिन्दी क विश्वकोष यहाँ उपलब्ध है।
Sunday, November 28, 2004
यार जुलाहे
पैबंदें भी मसक गयी हैं
झिर-झिर रिसता शीत लहू में
दरक गई है धड़कन जमकर
सिसकी जैसे अतिक्रंदन की
यार जुलाहे……
भेद रही है पछुआ दिल को
कोई पिरोये नश्तर जैसे
बुझे हैं दीपक, बुझी अलावें
प्राणांतक षडयंत्र शीत का
कोप हो जैसे कैकेयी का
यार जुलाहे ………
बुन कुछ ऐसी, अबके चादर
तान के लंबी, बेचूँ घोड़े
बुन लूँ मैं कुछ ख़ाब सुनहरे
ग़र सूरज भी निकले सिर पर
ख़ाब हमारा कभी न पिघले
यार जुलाहे……
Sunday, November 21, 2004
लालिमा
जो चुनरी की लाल सलवटों से हो,
तेरे होठों कि दहक में फैल जाती है,
और झरती है बनके फूँह, बूँद-बूँद
कभी तेरी हया, कभी क्रोधाग्नि होकर॥
रुप के प्रारुप से होता है साक्षात,
निश दिन, उषा की अंगड़ाई से,
प्रात: के किरणों की तरुणाई से,
बोझिल साँझ शिथिल होने तक,
रहता है शेष किन्तु वही सूर्य, वही तू॥
बदलती हुई मुख-भंगिमा तेरी
बदलती हुई लालिमा- सूरज की
ताकता रहता हूँ अभिभूत सा
समझ आते हैं अभिप्राय तेरे सारे
पहचानने लगा हूँ लालिमायें तेरी॥
Saturday, November 20, 2004
हिन्दी एक्सप्लोरर
अगर स्टेट्समैन के इस खबर को कुछ शुभ संकेत माना जाये तो हिन्दी जगत के तकनीकी विकास और कम्प्यूटर की दुनिया में सिर्फ़ हिन्दी समझने-बोलनेवालों के लिये एक और वरदान सामने आनेवाला है। अंग्रेजी अखबार के मुताबिक विदिशा निवासी 26 वर्षीय श्री जगदीप डांगी ने कुछ ऐसा कर दिखाने का दावा किया है कि जो माइक्रोसाफ्ट ने कुछ वर्षों पहले करने का प्रयास किया था और असफल रहे थे। बचपन में ही अपनी बाँयीं आँख और दाहिना पैर गँवा देने वाले डांगी ने हिन्दी एक्सप्लोरर का विकास कर सचमुच एक बड़ी उपलब्धी हासिल की है। अब श्री डांगी इस इंतज़ार में हैं कि माइक्रोसाफ्ट उनके इस इज़ाद को खरीदने के लिये आगे आएगी। श्री डांगी को मेरी और सभी हिन्दी प्रेमी भाई-बहनों की ओर से बधाइयाँ और शुभकामनायें।
पूरी खबर पढने के लिये अंग्रेजी अखबार ' द स्टेट्समैन' पर जायें।
Friday, November 19, 2004
लोकतंत्र-पथ उर्फ़ डेमोक्रैसी हाई-वे
निकला है रोड-रोलर
झाड़ जंग दशकों की,
इस रात के अंधेरे में
बस्तियाँ गिराने को,
लोकतंत्र-पथ बनाने को॥
समतल है करना जल्दी
है ठोस पथ बनाना,
कोलतार घट न जाये
मुक्ति के इस पथ की
रफ़्तार घट न जाये॥
चालक बड़ा पुराना है
कई पथ नये बनाये हैं,
जल्दी है अबके लेकिन
सूरज निकल न जाये
कहीं देर हो न जाये॥
चमचमायेगा पथ बनकर
सुबह तलक होने पर
चलेगी बस व लारी
और ऊँट की सवारी
सपनों की लाशें ढोने को॥
बग़दाद से न्यूयार्क तलक
इस मनोहारी पथ पर
हाँ टोल तो लगेगा
डालर अगर नहीं हो
तो तेल भी चलेगा॥